चुनाव-चर्चा. जब 2014 में केन्द्र में मोदी सरकार बनी तो जनता ही नहीं, जनसंघ और बीजेपी के समर्थकों ने भी सोचा था कि अब सत्तर साल बाद ही सही, अच्छे दिन आएंगे? लेकिन, जनता के तो छोड़ो, जनसंघ-बीजेपी समर्थकों के भी अच्छे दिन नहीं आए पीएम मोदी राज में! जनसंघ और बाद में बीजेपी के जमाने से ही कुछ विशेष मुद्दों पर कांग्रेस से बीजेपी के मतभेद रहे हैं.

जब 2014 में नरेन्द्र मोदी बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बने तो जनसंघ और बीजेपी के समर्थकों ने सोचा कि अब तो धारा- 370, राम मंदिर निर्माण, गौहत्या जैसे मुद्दों पर अच्छे नतीजे निकलेंगे, परन्तु सारी धारणाएं धरी रह गई? सियासी एकाधिकार के लिए पीएम मोदी के पांच साल अंदर-बाहर के राजनीतिक विरोधियों को किनारे करने में ही गुजर गए!

यह बात अलग है कि इन सियासी कदमों का फायदा तो नहीं मिला, उल्टे नुकसान हो गया? कहां कांग्रेस मुक्त भारत का सपना था और कहां राहुल गांधी चुनौती बन कर उभर गए? कहां राजनीतिक एकाधिकार की कोशिशें थी और कहां पार्टी के भीतर ही सियासी चुनौतियां खड़ी हो गई? कहां एकतरफा अनुशासन कायम करना था और कहां बगावत के स्वर बुलंद हो गए? तीन तलाक जैसे मुद्दों पर विरोधियों के वोटबैंक को साधते-साधते अपने ही वोटबैंक पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया? लोकसभा चुनाव अब अंतिम चरण में हैं और कोई चमत्कार नहीं होता है तो यह साफ है कि पीएम मोदी 2014 जैसी कामयाबी नहीं दोहरा पाएंगे, ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जब बहुमत के बावजूद धारा- 370, राम मंदिर निर्माण, गौहत्या जैसे मुद्दों के अच्छे दिन नहीं ला सके पीएम मोदी, तो अब क्या कर पाएंगे?

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