कलाकार- सनी देओल, इशिता दत्ता, करण कपाड़िया, करणवीर शर्मा

निर्देशक- बेहजाद खंबाटा

मूवी टाइप- ऐक्शन, थ्रिलर

अवधि- 2 घंटा 10 मिनट

किसी भी थ्रिलर फिल्म को दिलचस्प बनाने के लिए कई चीज़ों की जरूरत पड़ती है. एक तेज़ तर्रार कहानी, हैरत में डाल देने वाला सस्पेंस. साथ ही सधी हुई एक्टिंग और निर्देशन किसी भी थ्रिलर फिल्म को क्लासिक का दर्जा दिला सकता है. लेकिन सनी देओल और करण कपाड़िया की फिल्म ब्लैंक कई मायनों में चूक जाती है.  इस फिल्म से डिंपल कपाड़िया के भांजे, करण कपाड़िया ने डेब्यू किया है.

कहानी-  ब्लैंक की कहानी एक ईमानदार पुलिस ऑफिसर सिद्धू दीवान (सनी देओल) की, जो एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड का हेड है. वो अपनी ड्यूटी को लेकर इतना वफादार है कि वो इस मामले में किसी को नहीं बख्शता, चाहे उसका परिवार ही क्यों ना हो. दीवान को एक बेहद अजीब स्थिति का सामना करना पड़ता है जब एक जख्मी शख़्स (करण कपाड़िया) बेहोशी की हालत में अस्पताल पहुंचता है.

इस शख्स की छाती पर बम लगा है. उसकी धड़कन पर बॉम्ब की टाइमिंग सेट की गई है. सिद्धू को समझ आ जाता है कि अगर इस शख्स का दिल धड़कना बंद हुआ तो बम फट जाएगा. मुंबई शहर पर एक बड़ा खतरा मंडरा रहा है. और परेशानी भरी स्थिति ये भी है कि ये करण जो आतंकी है, अपनी याददाशत खो चुका है और उसे नहीं पता कि वो एक आतंकवादी है या नहीं. आगे क्या होता हैत ये जानने के लिए आपको सिनेमाघर तक जाना होगा.

निर्देशक बेहजाद खंबाटा ने कहानी की शुरुआत बहुत दिलचस्प ढंग से की, जहां मध्यांतर तक उत्सुकता बनी रहती है कि हनीफ की असलियत क्या है? आतंकियों के तार ढूंढने का ट्रीटमेंट दर्शकों को बांधे रखता है. मगर सेकंड हाफ में आकर कहानी बिखर जाती है. जेहाद जैसे विषय पर पहले भी कई फिल्में बन चुकी हैं.

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