योग भारत और नेपाल में एक आध्यात्मिक प्रकिया को कहते हैं जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने (योग) का काम होता है. यह शब्द, प्रक्रिया और धारणा बौद्ध धर्म,जैन धर्म और हिंदू धर्म में ध्यान प्रक्रिया से सम्बंधित है. योग शब्द भारत से बौद्ध धर्म के साथ चीन, जापान, तिब्बत, दक्षिण पूर्व एशिया और श्री लंका में भी फैल गया है और इस समय सारे सभ्य जगत् में लोग इससे परिचित हैं.

योग परम्परा और शास्त्रों का विस्तृत इतिहास रहा है, यद्यपि इसका बहुत सारा इतिहास नष्टहो गया है. किन्तु जिस तरह राम के निशान इस भारतीय उपमहाद्वीप में जगह-जगह बिखरे पड़े है उसी तरह योगियों और तपस्वियों के निशान जंगलों, पहाड़ों और गुफाओं में आज भी देखे जा सकते है.

भगवान शंकर के बाद वैदिक ऋषि-मुनियों से ही योग का प्रारम्भ माना जाता है. बाद में कृष्ण, महावीर और बुद्ध ने इसे अपनी तरह से विस्तार दिया. इसके पश्चात पातंजलि ने इसे सुव्यवस्थित रूप दिया. इस रूप को ही आगे चलकर सिद्धपंथ, शैवपंथ, नाथपंथ वैष्णव और शाक्त पंथियों ने अपने-अपने तरीके से विस्तार दिया.

यस्मादृते न सिध्यति यज्ञो विपश्चितश्चन. स धीनां योगमिन्वति.. ( ऋक्संहिता, मंडल-1, सूक्त-18, मंत्र-7)
अर्थात- योग के बिना विद्वान का भी कोई यज्ञकर्म सिद्ध नहीं होता. वह योग क्या है? योग चित्तवृत्तियों का निरोध है, वह कर्तव्य कर्ममात्र में व्याप्त है.

स घा नो योग आभुवत् स राये स पुरं ध्याम. गमद् वाजेभिरा स न:.. ( ऋग्वेद 1-5-3 )
अर्थात वही परमात्मा हमारी समाधि के निमित्त अभिमुख हो, उसकी दया से समाधि, विवेक, ख्याति तथा ऋतम्भरा प्रज्ञा का हमें लाभ हो, अपितु वही परमात्मा अणिमा आदि सिद्धियों के सहित हमारी ओर आगमन करे.

उपनिषद में इसके पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं. कठोपनिषद में इसके लक्षण को बताया गया है- तां योगमित्तिमन्यन्ते स्थिरोमिन्द्रिय धारणम्

योगाभ्यास का प्रामाणिक चित्रण लगभग 3000 ई.पू. सिन्धु घाटी की सभ्यता के समय की मोहरों और मूर्तियों में मिलता है. योग का प्रामाणिक ग्रंथ 'योगसूत्र' 200 ई.पू. योग पर लिखा गया पहला सुव्यवस्थित ग्रंथ है.

हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म में योग का अलग-अलग तरीके से वर्गीकरण किया गया है. इन सबका मूल वेद और उपनिषद ही रहा है.

वैदिक काल में यज्ञ और योग का बहुत महत्व था. इसके लिए उन्होंने चार आश्रमों की व्यवस्था निर्मित की थी. ब्रह्मचर्य आश्रम में वेदों की शिक्षा के साथ ही शस्त्र और योग की शिक्षा भी दी जाती थी. ऋग्वेद को 1500 ई.पू. से 1000 ई.पू. के बीच लिखा गया माना जाता है. इससे पूर्व वेदों को कंठस्थ कराकर हजारों वर्षों तक स्मृति के आधार पर संरक्षित रखा गया था.

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