मुंबई. लोकसभा चुनाव के लिए शिवसेना और बीजेपी ने अपने अतीत के मतभेदों को भुलाकर गठबंधन किया है. तमाम मौकों पर प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी की नीति पर हमला करने वाला शिवसेना इन दिनों जमकर गठबंधन का धर्म निभा रहा है. शिवसेना इन दिनों पीएम मोदी और बीजेपी नहीं बल्कि विपक्षी पार्टियों पर जमकर हमला कर रहा है. शिवसेना का कहना है कि केंद्र में एकबार फिर मोदी सरकार ही आएगी. साथ ही पार्टी का कहना है कि अगर विपक्ष सत्ता में आता है तो महागठबंधन की पार्टियों में पीएम पद को लेकर झगड़ा होगा. शिवसेना में अपने मुख पत्र सामना के संपादकीय में लिखा है कि उत्तर प्रदेश में मायावती की सार्वजनिक सभा में एक सांड़ घुस गया.

सांड़ ने सभा के लिए जमी भीड़ को तितर-बितर कर दिया. उस सभा के लिए अखिलेश यादव भी हेलिकॉप्टर से पहुंचनेवाले थे. अखिलेश ने हेलिकॉप्टर से ही मैदान पर जारी सांड़ की करतूतों को देखा और जब तक सांड़ शांत नहीं हुआ तब तक यादव ने अपना हेलिकॉप्टर उतारने की हिम्मत नहीं दिखाई. मायावती ने आरोप लगाया कि सभा में सांड़ छोड़ने की यह साजिश भारतीय जनता पार्टी की है. विरोधियों की सभा को उजाड़ने के लिए भाजपा को इस तरह के सांड़ों की सचमुच जरूरत है क्या? शत्रुघ्न सिन्हा ने कांग्रेस की चार आने की सदस्यता स्वीकार की और उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना का गुणगान शुरू किया है.

लोगों का आक्रोश बढ़ता देख सिन्हा बोले- ‘नहीं, मुझे मौलाना आजाद का नाम लेना था. गलती से जिव्हा से जिन्ना का नाम निकल गया!’ कांग्रेस के ‘पेट का’ जिन्ना आखिरकार इस तरह होंठों पर आ ही जाता है. सिन्हा की इसमें कोई गलती है, ऐसा हमें नहीं लगता. सांड़ जिस तरह सभा उजाड़ते हैं, उसी तरह पुराने जानकार नेता भी अपनी नीति और विचारों को उड़ाते रहते हैं और बाद में सीधे-सीधे मुकर जाते हैं. साथ ही शिवसेना ने सामना में लिखा है कि शरद पवार ने भी अब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के बारे में एक बयान देकर कोलाहल मचाने का प्रयोग किया है. भाजपा प्रणीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बहुमत हासिल करने में असफल रहा तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्राबाबू नायडू और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती, ये तीन लोग प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लगते हैं.

पवार के इस बयान से खलबली कम और खलबलाहट अधिक मची है. खलबली मचने का सवाल ही नहीं लेकिन कांग्रेस के गुट में उम्मीद के अनुरूप खलबलाहट हुई है. प्रधानमंत्री पद के लिए शरद पवार का समर्थन नहीं है, ऐसा नाराजगी का स्वर उभरा है. कहीं पर कुछ भी न होते हुए कांग्रेस महाआघाड़ी में प्रधानमंत्री पद को लेकर ‘मारा-मारी’ होने की तस्वीर दिखने लगी है. राहुल गांधी ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं, ऐसा कांग्रेस के प्रवक्ता कहने लगे हैं. अब पवार ने हमेशा की तरह शब्दों को घुमा दिया है और मेरे बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया, ऐसा स्पष्टीकरण दिया है.

राहुल गांधी के अलावा प्रधानमंत्री पद के लिए महाआघाड़ी के पास और कौन से नेता हैं? इस सवाल के जवाब में मैंने तीन पात्रों के नाम लिए थे, ऐसा पवार कितना भी क्यों न कह रहे हों, फिर भी इस नाटक के ‘चौथे’ या ‘पांचवे’ पात्र खुद शरद पवार हैं. देश में सरकार स्थिर होनी चाहिए, ऐसा पवार ने कल कहा. लेकिन ममता, मायावती, चंद्राबाबू में स्थिर सरकार देने की क्षमता है क्या? इसका जवाब पवार को देना होगा. महाराष्ट्र के चुनाव अब खत्म हो गए हैं. इसलिए पवार को सच बोलने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए. इतना ही नहीं विपक्षी पार्टियों पर हमला करते हुए शिवसेना ने समाना में लिखा है कि 2014 में महाराष्ट्र में त्रिशंकु विधानसभा चुनकर आई थी.

उस समय भी किसी के न मांगने पर भी पवार ने राज्य में सत्ता स्थापना के लिए भाजपा को खुद ही समर्थन घोषित कर दिया था. क्यों? तो बोले, स्थिर सरकार के लिए. स्थिर सरकार पवार की राजनीति का एक सांकेतिक शब्द है. इसलिए कल दो-पांच सीटों की कमी हो गई तो खुद शरद पवार स्थिर सरकार के नाम तले मोदी को समर्थन कर दें तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा. क्योंकि पवार के सपनों के ‘पात्रों’ के मंत्रिमंडल में अनुभवी और वरिष्ठ पवार कैसे काम करेंगे? खुद शरद पवार भले ही स्थिर सरकार की गप हांक रहे हों मगर उनकी राजनीति को कभी स्थिरता नहीं मिली.

पु.लो.द. का उनका मंत्रिमंडल भी अस्थिर था और उसके बाद कई बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें स्थिरता नहीं मिली थी. कांग्रेस विरोधी नीति पवार ने दो बार ली. एक बार इंदिरा गांधी के रहते हुए तो दूसरी बार सोनिया गांधी के विरोध में विदेशी वंश का मुद्दा उठाकर उन्होंने ‘बगावत’ की लेकिन अंतत: बगावत ठंडी पड़ गई और कांग्रेस से ही हाथ मिलाकर पवार फिर केंद्र में मंत्री बन गए. इस बार भी कहीं की ईंट और कहीं का रोड़ा जोड़कर कुछ नया किया जा सकता है क्या? इस ताक में वे हैं. उन्होंने प्रधानमंत्री पद के तीन पात्रों के नाम घोषित किए हैं. अब चौथा नाम गलती से रह गया है वह राहुल गांधी का. खुद पवार पांचवें हैं. हालांकि इन पांचों पात्रों को दिल्ली के रंगमंच पर भूमिका मिलने की बिल्कुल भी संभावना नहीं है. दिल्ली की मौजूदा स्थिति बरकरार रहेगी. ये स्थिति बिगड़ेगी, ऐसा माहौल देश में नहीं है.

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