आलू एक अर्द्धसडनशील सब्जी वाली फसल है. इसकी खेती रबी मौसम या शरदऋतु में की जाती है. इसकी उपज क्षमता समय के अनुसार सभी फसलों से ज्यादा है इसलिए इसको अकाल नाशक फसल भी कहते हैं. इसका प्रत्येक कंद पोषक तत्वों का भण्डार है, जो बच्चों से लेकर बूढों तक के शरीर का पोषण करता है. अब तो आलू एक उत्तम पोष्टिक आहार के रूप में व्यवहार होने लगा है. बढ़ती आबादी के कुपोषण एवं भुखमरी से बचाने में एक मात्र यही फसल मददगार है.

खेत का चयन 

ऊपर वाली भीठ जमीन जो जल जमाव एवं ऊसर से रहित हो तथा जहाँ सिंचाई की सुविधा सुनिश्चित हो वह खेत आलू की खेती के लिए उपयुक्त है. खरीफ मक्का एवं अगात धान से खाली किए गए खेत में भी इसकी खेती की जाती है.

खेत की जुताई

ट्रैक्टर चालित मिट्टी पलटने वाले डिस्क प्लाउ या एम.बी. प्लाउ से एक जुताई करने के बाद डिस्क हैरो 12 तबा से दो चास (एक बार) करने के बाद कल्टी वेटर यानि नौफारा से दो चास (एक बार) करने के बाद खेत आलू की रोपनी योग्य तैयार हो जाता है. प्रत्येक जुताई में दो दिनों का अंतर रखने से खर-पतवार में कमी आती है तथा मिट्टी पर अच्छा प्रभाव पड़ता है. प्रत्येक जुताई के बाद हेंगा तथा खर-पतवार निकालने की व्यवस्था की जाती है. ऐसा करने से खेत की नमी बनी रहेगी तथा खेत खर-पतवार से मुक्त हो जाएगा.

खर-पतवार से मुक्ति के लिए जुताई से एक सप्ताह पूर्व राउंड अप नामक तृणनाशी दवा जिसमें ग्लायफोसेट नामक रसायन (42 प्रतिशत) पाया जाता है उसका प्रति लीटर पानी में 2.5 (अढ़ाई) मिली लीटर दवा का घोल बनाकर छिड़काव करने से फसल लगने के बाद खर-पतवार में काफी कमी हो जाती है.
खाद एवं उर्वरक
आलू बहुत खाद खाने वाली फसल है. यह मिट्टी के ऊपरी सतह से ही भोजन प्राप्त करती है. इसलिए इसे प्रचुर मात्रा में जैविक एवं रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता होती है.

इसमें सड़े गोबर की खाद 200 क्विंटल तथा 5 क्विंटल खल्ली प्रति हें. की दर से डाला जाता है. खल्ली में अंडी, सरसों, नीम एवं करंज जो भी आसानी से मिल जाय उसका व्यवहार करे. ऐसा करने से मिट्टी की उर्वराशक्ति हमेशा कायम रहती है तथा रासायनिक उर्वरक पौधों को आवश्यकतानुसार सही समय पर मिलता रहता है.

बीज दर

आलू का बीज दर इसके कंद के वजन, दो पंक्तियों के बीच की दूरी तथा प्रत्येक पंक्ति में दो पौधों के बीच की दूरी पर निर्भर करता है. प्रति कंद 10 ग्राम से 30 ग्राम तक वजन वाले आलू की रोपनी करने पर प्रति हें. 10 क्विंटल से लेकर 30 क्विंटल तक आलू के कंद की आवश्यकता होती है.
रासायनिक बीजोपचार
शीत भंडार से निकाले कंद को फफूंद एवं बैक्टिरिया जनित छुआ-छुत रोगों से सुरक्षा के लिए फफूंदनाशक एवं एन्टीवायोटिक दवा का व्यवहार किया जाता है. इसके लिए ड्राम, बाल्टी, नाद या टिन में नाप कर पानी लिया जाता है. प्रति लीटर पानी में 5 ग्राम इमिशान-6 तथा आधाग्राम यानि 500 मिलीग्राम स्ट्रोप्टोसाइक्लिन एन्टीवायोटिक दवा का पाउडर मिलाकर घोल तैयार किया जाता है. इस घोल में कंद को 15 मिनट तक डुबाकर रखने के बाद घोल से आलू को निकाल कर त्रिपाल या खल्ली बोरा पर छायादार स्थान में फैला कर रखा जाता है ताकि कंद की नमी कम हो जाय. घोल बहुत गंदा हो जाने पर या बहुत कम हो जाने पर उस घोल को फेंक कर फिर से पानी डालकर नया घोल तैयार कर लिया जाता है. फफूंदनाशक दवाओं में घोल तैयार करने वास्ते इमिशान-6 सस्ता पड़ता है. इसके अभाव में इन्डोफिल एम.-45, कैप्टाफ या ब्लाइटाक्स 2.5 ग्राम मात्र प्रति लीटर पानी में घोलकर घोल बनाया जा सकता है. इसका मतलब है कि रासायनिक बीजोपचार आवश्यक है. ऐसा करने से खेत में आलू की सड़न रुक जाती है तथा कंद की अंकुरण क्षमता बढ़ जाती है.

रोपनी की विधि

आलू रोपने के समय ही कुदाली से मिट्टी चढ़ाकर लगभग 15 सें.मी. ऊँचा मेड बना दिया जाता है तथा उसे कुदाली से हल्का थप-थप कर मिट्टी दबा दिया जाता है ताकि मिट्टी की नमी बनी रहे तथा सिंचाई में भी सुविधा हो.

यदि सुविधा हो तो बड़े खेत में पोटेटो प्लांटर से भी रोपनी की जाती है. इसके द्वारा समय एवं श्रम दोनों की बचत होती है.

यदि आलू में मक्का लगाना चाहते है तो आलू की मेड के ठीक नीचे सटाकर आलू रोपनी के पाँच दिन के अंदर खुरपी से 30 सें.मी. की दूरी पर मक्का बीज की बुआई कर दें. ऐसा करने से आलू के साथ सिंचाई में भी बाधा न होगी. मक्का-आलू साथ लगाने पर मक्का के लिए पूरी खाद की मात्रा तथा आलू के लिए आधी खाद की मात्रा का प्रयोग करें. मक्का-आलू साथ लगाने पर एक ही खेत से एक ही सीजन में कम लागत में दोनों फसल की प्राप्ति हो जाती है तथा आलू का क्षेत्रफल भी बढ़ सकता है. बचे हुए खेत में दूसरी फसल लगायी जा सकती है.

सिंचाई

कहावत है – आलू एवं मक्का पानी चाटता है – पीता नही है. इसलिए इसमें एक बार में थोड़ा पानी कम अंतराल पर देना अधिक उपज के लिए लाभदायक है. चूँकि खाद की मात्रा ज्यादा रखी जाती है इसलिए रोपनी के 10 दिन बाद परन्तु 20 दिन के अंदर ही प्रथम सिंचाई अवश्य करनी चाहिए. ऐसा करने से अकुरण शीघ्र होगा तथा प्रति पौधा कंद की संख्या बढ़ जाती है जिसके कारण उपज में दो गुणी वृद्धि हो जाती है. प्रथम सिंचाई समय पर करने से खेत में डाले गए खाद का उपयोग फसलों द्वारा प्रारंभ से ही आवश्यकतानुसार होने लगता है. दो सिंचाई के बीज का समय खेत की मिट्टी की दशा एवं अनुभव के आधार पर घटाया बढ़ाया जा सकता है. फिर भी दो सिंचाई के बीच 20 दिन से ज्यादा अंतर न रखें. खुदाई के 10 दिन पूर्व सिंचाई बंद कर दें. ऐसा करने से खुदाई के समय कंद स्वच्छ निकलेंगे. ध्यान रखें प्रत्येक सिंचाई में आधी नाली तक ही पानी दें ताकि शेष भाग रिसाब द्वारा जम हो जाय.

खुदाई

बाजार भाव एवं आवश्यकता को देखते हुए रोपनी के 60 दिन बाद आलू का खुदाई की जाती है. यदि भंडारण के लिए आलू रखना हो तो कंद की परिपक्वता की जाँच के बाद ही खुदाई करें. परिपक्वता की जाँच के लिए कंद को हाथ में रखकर अंगूठा से दवाकर फिसलाया जाता है यदि ऐसा करने पर कंद का छिलका अगल नहीं होता है तो समझा जाता है कि कंद परिपक्व हो गया है. ऐसे कंद की खुदाई करने से भंडारण के कंद सड़ता नहीं है. खुदाई दिन के 12.00 बजे तक पूरा कर लेनी चाहिए. खुदे कंद को खुले धूप में न रखकर छायादार जगह में रखा जाता है. धूप में रखने पर भंडारण क्षमता घट जाती है. 15 मार्च तक आलू के सभी प्रभेदों की खुदाई अवश्य पूरी कर लेनी चाहिए. खुरपी या पोटेटो डीगर से खुदाई की जाती है. खुरपी से खुदाई करने पर ध्यान रहे आलू कटने न पावें. कहावत है – आलू नहीं कटती हैं, तकदीर कट जाती है.

यदि आलू को शीत भंडार भेजना है तो कटे एवं सड़े आलू की छाँटकर खुदाई के एक सप्ताह बाद बोरा में बंद कर भेज दें. प्रत्येक बोरा के अंदर प्रभेद का नाम लिख दें तथा बोरा के ऊपर भी अपना पता लिख दें.

उपज
परिपक्वता अवधि एवं अनुशंसित फसल प्रणाली को अपनाने पर रोपनी के 60 दिन बाद 100 क्विंटल, 75 दिन बाद 200 क्विंटल, 90 दिन बाद, 300 क्विंटल तथा 105 दिन बाद प्रभेद के अनुसार 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जाती है. परन्तु यदि प्रथम सिंचाई रोपनी के 10 दिन बाद तथा 20 दिन के अंदर न हुआ तो उपज आधी हो जायगी.

खेत गहरा न जोता जाए तो बहुत बार जोतने से भी क्या लाभ होगा? इसलिए गहराई से जोतना जरूरी है. अच्छी फसल के लिए खेती की हेंगाई मतलब खेती की मिट्टी फोड़ना बहुत जरूरी है.

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