पलपल संवाददाता, जबलपुर. मध्य प्रदेश की जबलपुर लोकसभा सीट एमपी के साथ ही पूरे देश की उन चुनिंदा प्रतिष्ठित सीट में शुमार हो गई है, जिस पर सभी नेताओं के साथ-साथ राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें लगी हैं, क्योंकि यहां पर एमपी भाजपा के अध्यक्ष व जबलपुर से लगातार तीन बार जीत चुके राकेश सिंह चौथी बार जीत का चौका लगाने का सपना संजोए हैं, वहीं उनके सामने राज्यसभा सांसद व कांग्रेस के दिग्गज नेता विवेक तन्खा हैं, तन्खा की कोशिश, राकेश का विजयी चौका रोकने की है.

संस्कारधानी जबलपुर में भाजपा व कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर है. भाजपा केेंडीडेट राकेश सिंह ने जहां सोमवार 8 अप्रेल को अपना नामांकन पत्र भरा, वहीं कांग्रेस केंडीडेट विवेक तन्खा ने मंगलवार 9 अप्रेल को विशाल रैली निकालकर नामांकन भरा और शहर की सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन करते हुए विपक्षी खेमे भाजपा को चेता दिया है कि इस बार जीत आसान नहीं है, बल्कि कांटे की टक्कर है और कांग्रेस बाजी भी पलट सकती है.

जबलपुर है आरएसएस का गढ़, भाजपा लगातार 6 बार से जीत रही

महाकौशल का प्रमुख केंद्र जबलपुर में कांग्रेस को 28 साल बााद एक बार फिर जीत की तलाश है. उसे लगता है कि जिस प्रकार पिछले विधानसभा चुनाव में जबलपुर में कांग्रेस के पक्ष में माहौल बना है, यदि वही ट्रेंड कायम रहता है तो कांग्रेस अपना 25 साल का सूखा समाप्त कर भाजपा प्रत्याशी राकेश सिंह को चौथी बार संसद में जाने से रोक सकती है. इस सीट पर कांग्रेस को अखिरी बार 1991 में जीत मिली थी. उसके बाद से बीजेपी लगातार यहां से छह बार जीती है.

2014 में भी विवेक-राकेश थे आमने-सामने

बीजेपी ने एक बार फिर वर्तमान सांसद और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह को इस सीट से उम्मीदवार बनाया है. कांग्रेस ने इस बार लोकसभा चुनाव में अपनी रणनीति बदली है. पार्टी कठिन सीटों पर अपने बड़े चेहरों पर दांव लगा रही है. एक बार फिर कांग्रेस ने विवेक तन्खा को इस सीट पर टिकट दिया है. 2014 में भी तन्खा को मौका मिला था, लेकिन वह मोदी लहर में हार गए थे.

कांग्रेस के सभी गुट एकजुट, जीत के लिए जुटे

राकेश सिंह यहां से वर्तमान सांसद हैं, वह बीजेपी के इस समय प्रदेश अध्यक्ष भी हैं. सिंह इस चौथी बार जीत की फिराक में हैं, लेकिन इस बार बीजेपी के लिए राह आसान नहीं है. 2014 में मोदी लहर के चलते कई उम्मीदवार जीते थे. जबलपुर में विकास बहुत बड़ा मुद्दा है. तन्खा इसी बात को भुनाने में लगे हैं. यही नहीं बीजेपी के खिलाफ इस सीट पर सत्ता विरोधी लहर भी है, इसके अलावा पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा के गढ़ वाले 4 विस क्षेत्र को भेदने में सफलता हासिल की है, उसे लगता है कि वह लोकसभा में भी यही परिणाम दोहरायेगी, बल्कि और बेहतर रिजल्ट ला सकेगी. जिसके लिए सभी कांग्रेसी एकजुट होकर चुनाव मैदान में डटे हुए हैं, लेकिन सवाल यह है क्या कांग्रेस इन सबको जीत में बदलने में कामयाब हो सकती है. तन्खा की बेदाग छवि है वह बीजेपी की विफलताओं जनता के सामने लेकर जा रहे हैं.

जबलपुर का यह है राजनीतिक इतिहास

जबलपुर सीट लगातार कांग्रेस के दिग्गज नेता सेठ गोविंद दास ने जीती थी, जो 1957 (जब सीट अस्तित्व में आई) से लेकर 1971 तक इसे जीतते रहे. 1975 में, जब सेठ गोविंद दास की मृत्यु हुई, तो चुनाव की आवश्यकता पड़ी और, शरद यादव (समर्थित) जयप्रकाश नारायण) यहाँ से उपचुनाव में जीते, कांग्रेस के रवि मोहन दास को हराया. बाद में, जनता की लहर के दौरान यादव 1977 में फिर से यहां से चुने गए, जब उन्होंने कांग्रेस के जेएन अवस्थी को हराया. 1980 में, कांग्रेस के मुंदर शर्मा ने राजमोहन गांधी को हराया. 1982 में, भाजपा के बाबूराव परांजपे ने पहली बार भाजपा के लिए सीट जीती.

उन्होंने रत्ना देवी को हराया. बाद में, 1984 में, कांग्रेस के अजय नारायण मुशरन ने परांजपे को भारी अंतर से हराकर सीट जीत ली. लेकिन 1989 में परांजपे ने मुशरन को 1 लाख से अधिक मतों से हराया. दो साल बाद, कांग्रेस ने सीट वापस ले ली जब श्रवण पटेल ने परांजपे को हराया. हालांकि, तब से बीजेपी जबलपुर में लोक सभा चुनाव नहीं हारी है. 1996 में, परांजपे ने पटेल को लगभग 70000 मतों के अंतर से हराया. 1998 में परांजपे ने कांग्रेस उम्मीदवार डॉ. आलोक चंसोरिया को 84000 मतों से हराया. 1999 में अगले चुनाव में, भाजपा ने जयश्री बनर्जी को मैदान में उतारा, जिन्होंने कांग्रेस के चंद्र मोहन को 1.1 लाख मतों से हराया.

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