खबरंदाजी. एमपी के सीएम कमलनाथ से जुड़े लोगों के दिल्ली और एमपी स्थित करीब पचास ठिकानों पर आयकर विभाग की छापेमारी को कांग्रेस ने राजनीतिक बदला बताया है, तो पीएम मोदी सरकार में वित्त मंत्रालय संभाल रहे अरुण जेटली का कहना है कि... इनकम टैक्स जैसी एजेंसियां चुनाव के दौरान काले धन पर नजर रखती हैं. यह उनका काम है. राजनीति से इसका कोई लेना-देना नहीं है. वे हमारे पास नहीं आतीं और रिपोर्ट भी नहीं करती हैं!

यह बात अलग है कि... निर्वाचन आयोग ने वित्त मंत्रालय को सलाह दी कि चुनाव के दौरान उसकी प्रवर्तन एजेंसियों की कोई भी कार्रवाई “निष्पक्ष” और “भेदभाव रहित” होनी चाहिए तथा ऐसी कार्रवाई की जानकारी चुनाव आयोग के अधिकारियों के संज्ञान में होनी चाहिए? 

खबर है कि... आयोग की यह सलाह मध्य प्रदेश में की गई आयकर विभाग की छापेमारी और कुछ समय पहले कर्नाटक, आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु में राजनीतिक नेताओं या उनसे जुड़े लोगों के ठिकानों पर मारे गए छापों की पृष्ठभूमि में आई है! वित्त मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली एजेंसियों ने अब तक छप्पन के करीब छापेमारी की हैं? 

खबर यह भी है कि... कमलनाथ के पूर्व ओएसडी ने केंद्र की बीजेपी सरकार पर निशाना साधतेे हुए कहा कि- पीएम मोदी सरकार पूरे देश में विपक्ष के नेताओं को निशाना बना रही है, जबकि बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विजयवर्गीय का ट्वीट है कि- जो चोर है, उसे ही चौकीदार से शिकायत है?

वैसे, पक्ष-विपक्ष की बयानी महाभारत में कौन चोर है और कौन चौकीदार है, यह जानना बहुत ही मुश्किल है? लेकिन क्योंकि, केन्द्र सरकार भ्रष्टाचार मुक्त हो चुकी है, इसलिए जो विपक्ष में है वह चोर है और जो सत्ता में है वह चौकीदार है! 

अब विपक्ष में बैठे नेताओं को कौन समझाए कि जो लोग सत्ता में होते हैं, वे हमेशा स्वप्रमाणित ईमानदार होते हैं और जो विपक्ष में होते हैं वे घोषित भ्रष्ट! क्योंकि, सक्षम अधिकारियों की पीठ सत्ता की ओर होती है, इसलिए उन्हें केवल विपक्ष ही नजर आता है. चुनाव और चाहत में सब जायज है, क्योंकि चुनाव जारी हैं, इसलिए कुर्सी की चाहत में जो भी किया जाए वह मान्य होना चाहिए? विपक्ष के शिकवे-शिकायत बेमतलब हैं! ऐसे भी, सत्तर वर्षों में पहली बार तो देश भ्रष्टाचार मुक्त हुआ है, फिर काहे के शिकवे-शिकायत?

देश के किसान पता नहीं क्यों आत्महत्त्या कर रहे हैं, जबकि कई नेताओं की लाखों-करोड़ों की आय का तो आधार ही खेती-किसानी है? किसान खेत में पसीना बहा कर भी कुछ खास कमा नहीं पा रहा है और नेता देशभर में सभाएं करते हैं, रैलियां करते हैं और भले ही खेतों की ओर नजर उठा कर देखते भी नहीं हों, तब भी कमाई करोड़ों में हो रही है! 

इसकी खास वजह यह है कि किसानों के पास खेती-किसानी का ज्ञान भले ही हो, उनका अर्थशास्त्र बेहद कमजोर हैं? किसान जब तक सियासी आलू से सोना बनाने का ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाएंगे, तब तक तो परेशान ही रहेंगे!

सियासी सयानों का तो साफ कहना है कि- राजनीति में राग ईमानदारी के लिए कोई जगह नहीं है, इसलिए जो पकड़ा जाए वो चोर है और जो नहीं पकड़ा जाए वह चौकीदार है?

यदि आपके पास कागजों में हिसाब मेंटेन है, तो पार्टी का चमचमाता दफ्तर भी जायज है और यदि कागज नहीं हैं तो मंदिर भी गैरकानूनी है?

क्योंकि, कुर्सी की चाहत में सबकुछ जायज है, इसलिए विपक्ष को सरकार के खिलाफ बेहिसाब ट्वीट करने की नहीं, कागजों में हिसाब मेंटेन करने वाले अर्थशास्त्रियों की जरूरत है!

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