अगर हम भारत के इतिहास के बारे में बात करें तो सबसे पहले अंग्रेज़ो की गुलामी का ही प्रसंग सुनने को मिलता है. परन्तु हम बात कर रहे हैं उस इतिहास की जब भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था. ऐसे क्या कारण रहे होंगे की भारत विश्वगुरु बना? आखिर क्यों भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था? और किसने यह ख़िताब भारत को दिया?

आइए जानते हैं –

क्या आपने कभी उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के बारे में सुना है? वही जिन्हें उनके ज्ञान, धर्म, न्याय, वीरता एवं उदारता की लिए जाना जाता था. वही विक्रमादित्य जिनकी बेताल पच्चीसी की कहानी आज भी प्रसिद्ध है. वो ही वे महान राजा थे जिन्होंने भारत को सोने की चिड़िया का ख़िताब दिया था. चलिए जानते हैं राजा विक्रमादित्य के बारे में:-

विक्रमादित्य में दो शब्द हैं- ‘विक्रम’ और ‘आदित्य’ जिसका अर्थ है सूर्य के समान पराक्रमी. राजा विक्रमादित्य ने अपने नाम का मतलब सार्थक किया है. भारत के इतिहास में एक ऐसा वक़्त आ गया था जब देश में बौद्ध और जैन रह गए थे. सनातन धर्म लगभग लुप्त होने की कगार पे था. तब राजा विक्रमादित्य ने रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथो ी फिर से खोज कर स्थापित करवाया था. इन्होने कई मंदिरों का निर्माण करवाया था.

उज्जैन के राज दरबार की शोभा विक्रमादित्य के नवरत्न बढ़ाते थे. नवरत्न यानि नौ विद्वान् जो अपने-अपने क्षेत्र में महाज्ञानी हैं.

विक्रमार्कस्य आस्थाने नवरत्नानि

धन्वन्तरिः क्षपणकोऽमरसिंहः शंकूवेताळभट्टघटकर्परकालिदासाः।

ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेस्सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य॥

इनके नाम कुछ इस प्रकार हैं- धन्वंतरि, क्षपनक, अमरसिंह, शंकु, खटकरपारा, कालिदास, वेतालभट्ट, वररूचि और वराहमिहिर.

विक्रमादित्य का राजकाल केवल नवरत्नों के कारण प्रतिष्ठित नहीं था बल्कि यहां के न्याय के कारण भी इसे सर्वश्रेष्ठ माना गया है. कहा जाता है कि कई बार तो देवतागण भी महाराज से न्याय करवाने आते थे.

राजा का कर्तव्य केवल धर्म की रक्षा करना या सही न्याय करना नहीं होता. राजा का कर्तव्य प्रजा की रक्षा, उनकी आर्थिक स्थिति का ख्याल रखना बभी होता है और यह विक्रमादित्य भली-भांति जानते थे. उनके राज में भारत का कपड़ा विदेशी व्यापारी सोने के वजन से खरीदते थे. यह ही नहीं उस वक़्त तो भारत में सोने के सिक्कों का भी चलन था.

विक्रमादित्य ने भारत को सोने की चिड़िया का ख़िताब क्यों दिया?

* मुख्य कारण यह है कि विदेशी व्यापारी यहां से कई चीज़ों का व्यापर कर के जाते थे, इसके बदले वे सोना देते थे. इस वजह से यह सोना अत्यधिक मात्रा में था.

* पद्मनाभस्वामी मंदिर में कितने हज़ारों टन का सोना छुपा हुआ मिला. इसके अलावा कोहिनूर, मोर सिंघासन और ताजमहल में जड़े हीरे पन्नों की वजह से हम अंदाज़ा तो लगा ही सकते कि उस वक़्त भारत के निवासी कितने अमीर होते थे. 

* भारत जो कि कृषि-प्रधान देश हमेशा से रहा है, इसे उस वक़्त किसी भी चीज़ की कमी नहीं थी. जो भी लागत से अधिक सामान होता था वो बाहर के देशो में बेच दिया जाता था. इसके अलावा भारत में खनिज की खदानें मौजूद थीं. जिससे हथियार, सिक्के आदि बनाने में मदद मिलती थी.

यह सब जानकर आपको यकीन हो गया होगा कि जो ख़िताब राजा विक्रमादित्य ने भारत को दिया वह पूर्णतः सच है. यह पढ़ कर आपको ज़रूर अपने देश पर गर्व होगा कि हमारा इस भूमि पर जन्म लेना कितने बड़े सौभाग्य की बात है परन्तु हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि आज फिर भारत विश्वगुरु बन सकता है. बस इंतज़ार है तो सच्ची कोशिश और निष्ठा का.

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