जयपुर. राष्ट्रीय जनचेतना मंच के राष्ट्रीय संरक्षक कोटाशंकर शर्मा ने सभी मतदाताओं से आग्रह किया है कि लोकसभा चुनावों में अपने क्षेत्र के जनप्रतिनिधि का चयन करने से पूर्व जागरूकता से चिन्तन करें और योग्य व पात्र उम्मीदवार को अपना मत व समर्थन दें ताकि को ससंद में वो न केवल आपसे क्षेत्र के हित चिन्तन में सक्रियता से कार्य करे बल्कि राष्ट्र व समाज के लिये भी समर्पित भाव से काम कर सके. विभिन्न क्षेत्रांे के दौरे पर निकले शर्मा ने कहा कि राजनैतिक दल राजनीति में नैतिक मूल्यांे, राष्ट्रहित व देश में सर्वधर्म समन्वय व सहयोग भाव के मापदण्डों का पालन करते हुए अपने चुनावी घोषणा पत्रों को तैयार करें व वोट बंैक के स्थान पर जनहित को ध्यान में रखकर काम करें. ब्राह्मण नेता शर्मा देश में सरकारों द्वारा तुष्टीकरण के मद्देनजर बनाये गये विभिन्न असंगत कानूनों व व्यवस्थाओं को लेकर समय-समय पर अपना विरोध भी दर्ज करवा चुके हैं. 

शर्मा का मानना है कि भारत में धर्म, जाति, समाज व वर्ग के नाम पर कोई विवाद नही है और सभी वर्गांे के सम्पन्न लोग गरीब, जरूरतमन्द व पात्र लोगों की मदद हेतु सकारात्मक सोच रखते हैं. राजनैतिक दल अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिये धर्म, जाति, वर्ग, समाज, क्षेत्र, भाषा, उंच, नीच आदि विभिन्न मुद्दों के आधार पर देशवासियों की सौहार्दता, समन्वयता एवं सहयोग भाव को प्रभावित करने में जुटे हैं और यह ठीक नही है.

शर्मा ने कहा कि राजनैतिक दल दोहरे मापदण्ड अपना रहे हैं और देश की राजनीति में समानता के अधिकार की बात गौण होती जा रही है. आजादी के समय देश का नेतृत्व कर रहे सामान्य वर्ग के नेताओं ने ही अन्य सभी जाति व वर्गों के विकास एवं कल्याण को लेकर कई योजनायें व कार्यक्रम तय किये तथा संविधान में भी प्रभावी इंतजाम कर देश के समृद्ध विकास की नींव रखी थी, परन्तु समय के साथ राजनीति के हुए पतन ने देश में जाति और वर्गवाद को बढ़ावा दिया है और हालात ऐसे होते जा रहे हैं कि संसद में अतार्किक व असंगत कानून बन रहे हैं. सभी राजनैतिक दलों के लोग वर्ग व जाति विशेष के वोटों का नुक्सान होने के भय से मौन घारण कर समर्थन दे रहे हैं. सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे ऐसे लोगो द्वारा सही तथ्य व तर्क का भी प्रस्तुतीकरण नहीं किया जा रहा है, यह गंम्भीरता से विचारणीय है.

यह जानकारी देते हुए राष्ट्रीय जनचेतना मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष अश्विनी तिवारी तथा मंत्री रमेश ओझा ने लोकसभा चुनाव 2019 के लिये प्रमुख राजनैतिक दलों द्वारा किये गये टिकट वितरण में ब्राह्मण समाज के योग्य व पात्र उम्मीदवारों की उपेक्षा करने पर रोष व्यक्त करते हुए राजनैतिक दलों द्वारा वोट बैंक के लिये की जा रही राजनीति को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है. वादे करके भूल जाने, मौके पर मौके मांगने और अपनी उपलब्धियां बताने के नाम पर दूसरों की नाकामियां गिनाने का यह राजनैतिक दौर भारत को कहां ले जायेगा, यह विचारणीय है. तिवारी नेे कहा कि 21 वीं सदी के डिजिटल समय में भारत के नेता व राजनैतिक दल जाति व वर्ग के आधार पर काम कर रहे हैं और ऐसे मुद्दों को बढ़ाकर वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास किया जा रहा है. हालात यह है कि पुराने लोगों पर असफलता मढ़ कर अपनी कमजोरी व नाकामियों को छिपाने का प्रयास हो रहा है. आजादी के बाद तत्कालीन परिस्थितियों में देश के नेतृत्वकर्ताओं ने गुलामी से आजाद हुए देश को किस तरह खड़ा किया इसका अनुमान लगाये बगैर उन्हें नाकाबिल व नाकार सिद्ध करने की होड़ देश को कहां ले जायेगी. 

तिवारी ने कहा कि हास्यास्पद स्थिति है कि सर्वोच्च न्यायालय तर्क व तथ्य के आधार पर एक ऐसी व्यवस्था में बदलाव करता है जिसके दुरूपयोग की गंभीर शिकायतें हैं, परन्तु राजनेताओं की बैठक ससंद में न्यायपालिका के इस महत्वपूर्ण निर्णय को भी बदल कर प्रावधानों को अधिक सख्त बनाकर फिर से लागू कर दिया जाता है. उसके बाद कुछ राज्यों के चुनावों में सत्ता के हाथ से निकलने पर दूसरे वर्ग को राहत रूपी झुनझुना पकड़ा कर खुश करने का प्रयास किया जाता है और यह मामला भी अब न्यायालय के पास विचारार्थ लम्बित है. 

एक और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को बदल कर आनन-फानन में नया कानून बना दिया जाता है और दूसरे सभी मामलों में माननीय न्यायालय के फैसले की दुहाई दी जाती है. यह दोहरे मापदण्ड भारत की राजनीति में ही संभव हैं. घन्य हैं देश केे राजनेता व राजनैतिक दल जो वोटों के लिये जनता को भी बांटने से बाज नहीं आ रहे हैं. संविधान में फेरबदल नहीं करने की बात करने वाले नेता अपने हित में हुए संशोधनों को तो स्वीकार करते हैं, परन्तु अन्य वर्गों के लिये होने वाले लाभकारी निर्णयों को लेकर संविधान में बदलाव पर विरोध जता देते हैं. तिवारी ने कहा कि पाच साल के लिये चुने सांसद अस्थाई तौर पर व्यवस्था का हिस्सा हैं, उन्हे संविधान में बदलाव का क्या अधिकार है. दुनिया केे विकसित देशो की तर्ज पर महत्वपूर्ण मुद्दों व संविधान में बदलाव को लेकर जनमत संग्रह से काम करने की आवश्यकता है ताकि वोटों की राजनीति में पार्टियो के नेता मनमानी न कर सकें.

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