मध्यप्रदेश में मौजूदा सांसद नरेन्द्र सिंह तोमर के ग्वालियर की जगह मुरैना से लड़ने के बाद ग्वालियर लोकसभा फिलहाल एक हसीन ख्याब बनी हुई है. ये ख्वाब जिन्होंने ग्वालियर से जीत पाई है वे भी देख रहे हैं तो जिन्होंने लगातार ग्वालियर से हार का सामना किया है उनके लिए भी ग्वालियर सत्ता के ताज के रुप में दिख रही है.

लगभग समूची ग्वालियर कांग्रेस द्वारा प्रियदर्शिनी राजे सिंधिया को लड़ाए जाने का जो प्रस्ताव पारित हुआ है उससे बहुत हद तक सारा गणित सिंधिया के निर्णय के पर निर्भर है. निसंदेह इस वक्त सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ उनकी पत्नी प्रियदर्शिनी के लिए ग्वालियर लोकसभा जीतने का बेहतर और सुनहरा अवसर है. सत्ता कांग्रेस की है. 6 में से 5 विधायक कांग्रेसी हैं. सारे सिंधिया भक्त हैं. तीन मंत्रियों में भी 2 अटूट और 1 मध्यम श्रेणी के सिंधिया समर्थक हैं. सिंधिया विरोधी कोई नहीं.

तो प्रियदर्शिनी या ज्योतिरादित्य अगर लड़ते हैं तोे कांग्रेस से आसान जीत हांसिल करेंगे ये इस वक्त अधिकांश नागरिकों का आकलन है मगर गर सिंधिया अपनी धर्मपत्नी को लड़ाने से संकोच करते हैं तो फिर क्या. निसंदेह अशोक सिंह का दावा पुराना और मजबूत है सिर्फ उनकी तीन हारों के अड़ंगे को छोड़कर. इसके बाबजूद वे नमस्कार चमत्कार कला के मर्मझ हैं. झुकना जानते हैं और वहीं से जगह बनाना भी जानते हैं.

अशोक सिंह के आते ही संभवत भारतीय जनता पार्टी महल की ताकत को भुनाना चाहे. ग्वालियर में सिंधिया परिवार के प्रति आम नागरिकों में स्वच्छ छवि है और वे सालों साल जीतते रहे हैं. शिवपुरी से विधायक के बाद वे यशोधराराजे सिंधिया ग्वालियर से विजयी हुईं थी. उनके पास ग्वालियर में स्वयं का मजबूत गुट न था और ये उनके पक्ष वाली बात थी. भाजपा के साथ आम नागरिकों ने उन्हें राजमाता की लाड़ली बेटी के रुप में दिल से जिताया भी. यशोधराराजे इसके बाद अगले लोकसभा चुनाव में भी ग्वालियर में कांग्रेस के अशोक सिंह को आसानी से हराने में कामयाब रहीं.

वे अगर निरंतर एमपी रह पातीं तो संभवत मोदी कैबीनेट में 2014 में वे मंत्री भी होंती मगर ऐसा हुआ नहीं क्योंकि पार्टी उन्हें मप्र की राजनीति में वापिस ले आयी थी.

मप्र में 15 साल पुरानी सत्ता छिनने के बाद कांग्रेस ग्वालियर को हर हाल में जीतना चाहती है मगर महल का समर्थन भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए अहम रहेगा. महल वाले आमने सामने चुनाव नहीं लड़ते सो सिंधिया की न यशोधराराजे की हां का बड़ा कारण बन रही है. खबर है कि खुद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह महल फैक्टर को भुनाने यशोधराराजे को टिकट देना चाहते हैं मगर गिनती पहाड़े अभी इसके अलावा भी जारी हैं. मायासिंह मामी महल से हैं और उन्हें विधानसभा टिकट भी नहीं मिला है सो उनका दावा भी है मगर उनका दावा यशोधराराजे की राह का न तो बाधक है और न दो बार की एमपी के सामने मजबूत.

महापौर विवेक शेजवलक का नाम चल रहा है मगर उनकी छवि भले मानुष की है जो आजकल राजनीति में अनफिट का टैग लगने के लिए काफी है. आज जीत हार में 64 कलाओं और साम दाम दण्ड भेद में सिद्ध आपकी योग्यता कहलाती है. ग्वालियर से वरिष्ठ नेता अनूप मिश्रा और हिन्दूवादी जयभान सिंह पवैया भी भाजपा खेमे से हो सकते हैं मगर दोनों विधानसभा चुनाव में सफल नहीं हो सके हैं जो उनके दावे को कमजोर करने वाला कारण है.

जिस तरह से पिछले कई महीने से सिंधिया को लड़ाने जाने का वातावरण ग्वालियर में बना है उससे सिंधिया परिवार का खुला या आंतरिक समर्थन ग्वालियर लोकसभा के चुनाव में अहम रहने वाला है. ऐसे में कांग्रेस से भाजपा के सामने प्रियदर्शिनी राजे सिंधिया और भाजपा से यशोधराराजे सिंधिया जीत के लिए बेहतर स्थिति में दिखाई देती हैं.

देखते हैं दोनों दलों में से कौनसा दल सिंधिया परिवार से प्रत्याशी खड़ा करता है.

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