चुनावार्थ. पं. जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटलबिहारी वाजपेयी सहित तमाम बीसवीं सदी के प्रधानमंत्रियों ने जो लोकप्रियता हांसिल की थी, उसकी तुलना आज पीएम मोदी की लोकप्रियता से करना इसलिए बेमतलब है कि उन्होंने साइकिल से सियासी रेस जीती थी, जबकि पीएम मोदी टीम राजनीतिक मोटरसाइकिल पर सवार हो कर रेस जीतने की खुशफहमी पाले है? पं. जवाहर लाल नेहरू के समय देश का खजाना खाली था, सेना के गठन की प्रक्रिया चल रही थी, बावजूद इसके, उन्होंने चीन को झूला झुलाने के बजाय युद्ध लड़ा! जय जवान, जय किसान को बुलंद करने वाले लाल बहादुर शास्त्री के समय अन्न की जरूरत को लेकर उनकी एक अपील पर करोड़ों लोगों ने उनका साथ दिया, इस वक्त तमाम कोशिशों के बावजूद कितने चौकीदार सामने आए हैं? बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने ही कह दिया- मैं चौकीदार नहीं हूं, ब्राह्मण हूं! इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के दो टूकड़े तो किए ही, विदेशों में भी उनका रूतबा था.

यही नहीं, गलत या सही, आपातकाल जैसा कदम भी उन्होंने उठाया, लेकिन पीएम मोदी टीम तो एक हाथ से प्रेस के लिए आपातकाल जैसे निर्णय लेती है और दूसरे हाथ से निर्णय बदल देती है? राजीव गांधी से पहले किसी भी व्यक्ति की लोकप्रियता केवल प्रिंट मीडिया पर निर्भर थी, लेकिन आधुनिक तकनीक की नींव रखने वाले राजीव गांधी की बदौलत ही पीएम मोदी टीम सोशल मीडिया के दम पर इतनी अस्थाई लोकप्रियता हांसिल कर पाई है? अटलबिहारी वाजपेयी ने दुनिया की परवाह किए बगैर परमाणु परीक्षण कर दिखाया, तो बतौर गैरकांग्रेसी नेता, सबसे अधिक समय तक लोकप्रिय रहने का कीर्तिमान भी उनके नाम ही है.

पीएम मोदी तो 2014 में प्राप्त लोकप्रियता ही 2019 तक कायम नहीं रख पाए हैं? यही नहीं, स्थाई लोकप्रियता के मामले में तो पीएम मोदी के लालकृष्ण आडवानी से आगे निकलने की भी कोई संभावना नहीं है? अपने समय में हर प्रधानमंत्री लोकप्रिय रहता है, लेकिन विभिन्न सर्वे बताते हैं कि- लोकप्रियता के मामले में पीएम रहते, नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी में फर्क लगातार कम होता जा रहा है, यही नहीं, इन पांच वर्षों में कई राज्यों में तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से ही पीएम मोदी पिछड़ गए हैं? इनदिनों, आजादी के बाद के सत्तर वर्षों की उपलब्धियों पर सवाल खड़े करके प्रत्यक्षरूप से कांग्रेस का ही नहीं, अप्रत्यक्षरूप से बीजेपी का इतिहास भी बदलने की नाकामयाब कोशिशें जारी हैं, लेकिन यदि आजादी के बाद की उपलब्धियों पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, सुषमा स्वराज आदि के विचार जान लें, तो कईं नेताओं के भ्रम के जाले साफ हो सकते हैं!

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