चुनावार्थ. न तो पीएम नरेन्द्र मोदी और न ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की तरह लोकप्रिय हैं, तो फिर यदि राहुल गांधी और नरेन्द्र मोदी दो जगह से लोकसभा चुनाव लड़ते हैं, तो इसमें गलत क्या है?

चुनावी इतिहास बताता है कि किसी विशेष घटनाक्रम के कारण अचानक सियासी तस्वीर बदल सकती है और ऐसे में दिग्गज नेता भी चुनाव हार सकते हैं, इसलिए अव्वल तो पीएम पद के दावेदार नेताओं को मायावती की तरह चुनाव लड़ना ही नहीं चाहिए और लड़ना हो तो कम-से-कम दो सीटों से चुनाव लड़ना चाहिए!

भाजपा नेता स्मृति ईरानी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के दो जगहों से लोकसभा चुनाव लड़ने की संभावना के मद्देनजर व्यंग्यबाण चलाते हुए ट्वीट किया था कि- अमेठी ने भगाया, जगह-जगह से बुलावे का स्वांग रचाया, क्योंकि जनता ने ठुकराया!

लेकिन, वे संभवतया भूल गई कि पीएम नरेन्द्र मोदी ने भी 2014 का लोस चुनाव दो जगह से लड़ा था?

दरअसल, राहुल गांधी से गुजरिश की गई है कि वे दक्षिण भारत के कार्यकर्ताओं का निमंत्रण स्वीकार करें और वहां की एक जगह से भी चुनाव लड़ें! 

जाहिर है, इस निमंत्रण के पीछे एक उद्देश्य यह भी है कि उनकी दक्षिण भारत में चुनाव में मौजूदगी से कांग्रेस को दक्षिण भारत में फायदा होगा.

याद रहे, विभिन्न चुनावी सर्वे में पीएम पद के लिए जहां उत्तर भारत में नरेन्द्र मोदी आगे हैं तो दक्षिण के राज्यों में राहुल गांधी आगे हैं.

विभिन्न उपचुनावों के नतीजे बताते हैं कि सियासी समय बदलता है तो लाखों मतों की जीत, लाखों मतों की हार में बदल जाती है.

वाराणसी में पिछली बार नरेन्द्र मोदी ने निकटतम प्रतिद्वंद्वी आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल को 3,71,784 वोटों के अंतर से हरा दिया था. उन्हें कुल 5,81,022 वोट मिले, जबकि दूसरे स्थान पर रहे अरविंद केजरीवाल को 2,09,238 मत मिले. कांग्रेस उम्मीदवार अजय राय को 75,614, बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार विजय प्रकाश जायसवाल को 60,579, तो समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार कैलाश चैरसिया को 45,291 वोट मिले. इस वक्त 2014 वाला मोदी मैजिक तो है नहीं, और यदि विपक्ष एक हो गया तो पीएम मोदी के लिए चुनौती बढ़ जाएगी. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि वाराणसी से पीएम मोदी को हराना मुश्किल जरूर है, लेकिन बदले सियासी समीकरण में नामुमकिन नहीं है, इसलिए पीएम मोदी को वाराणसी के अलावा किसी और सीट से भी चुनाव लड़ना चाहिए!

अमेठी, गांधी परिवार की परंपरागत सीट रही है, लेकिन 2014 में पहली बार एक लाख से कुछ ज्यादा वोटों के अंतर से ही राहुल गांधी जीत दर्ज करवा पाए थे. 

चुनाव हारने के बाद से ही स्मृति इरानी ने प्रत्यक्ष, तो पीएम मोदी ने परोक्ष रूप से अमेठी को फोकस कर रखा है और पचास हजार वोटों के बदलाव से हार-जीत की गणित बदल सकती है, हालांकि राहुल गांधी के साथ इस बार 2014 के सापेक्ष कुछ अच्छे बदलाव भी हुए हैं, लिहाजा उन्हें अमेठी में हराना आसान नहीं है. एक तो- राहुल गांधी, विपक्ष में पीएम मोदी का विकल्प बन कर उभरे हैं, मतलब... अमेठी की जनता जानती है कि यदि गैरभाजपाई सरकार बनी तो राहुल गांधी प्रधानमंत्री होंगे, और दूसरा- राहुल गांधी के खिलाफ सपा-बसपा उम्मीदवार नहीं होंगे, जिसके कारण उन्हें गैरभाजपाई वोटों का फायदा मिलेगा!

अमेठी से राहुल गांधी को हराना मुश्किल है, बावजूद इसके, विभिन्न सियासी दबावों से बचने के लिए और अमेठी में किसी उलेटफेर से सुरक्षा के लिए राहुल गांधी को दो जगहों से लोकसभा चुनाव लड़ना चाहिए.

याद रहे, पलपल इंडिया ने सबसे पहले राजस्थान विधानसभा चुनाव के बाद लिखा था कि राहुल गांधी को अमेठी के अलावा राजस्थान से भी लोकसभा चुनाव लड़ना चाहिए, ताकि सपा-बसपा के सियासी दबाव से मुक्त रहें? इसके बाद से उनके लिए कई लोकसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ने की चर्चाएं होती रही हैं!

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