कल का अस्ताचल चिता की लपटों से गोवावासियों की लालिमा लपेट ले गया. कृतज्ञ राष्ट्र अन्तिम साँसों तक 'ऑन-ड्यूटी' रहने वाले अपने इस सपूत को, देश के शासनाध्यक्ष व अन्य गणमान्यों की उपस्थिति मे, पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम बिदाई दे रहा था. अनौपचारिक व्यक्तित्व की औपचारिक यात्रा स्मृति-पटल पर अमिट हो रही थी. गोवा की सड़कों पर चलने वाला "स्कूटर-मैन" दन्त-कथाओं की किंवदन्ति बन गया. 'हाउज द जोश...हॉई सर्.' सचमुच सभी का 'जोश'  'हॉई' कर गया.

ईश्वर ने आम आदमी से अचानक उसका 'करीबी' छीन लिया. मनोहर पर्रीकर मे हमने आदर्शों का सरलीकरण होते हुए न केवल देखा था, अपितु निकटता से अनुभव भी किया था. पहले आई-आईटिअन विधायक और सी.एम.के रूप मे उनकी प्रखर- प्रसानिक क्षमता और सटीक-सपाट फैसले उनकी दिनचर्या के अंग हुआ करते थे. अपने काम के प्रति मनोहर पर्रीकर का जो जुनून था, उसका कोई सानी नही.  पीओके पर पहली 'सर्जिकल-स्ट्राइक' कर अपने अपमान के घूंट को राष्ट्रीय सम्मान मे बदलने वाले पर्रीकर मील का पत्थर बन गए.  

ऐसा बहुत कम देखा जाता है, जो मनोहर पर्रिकर ने रक्षा मंत्री रहते हुए किया था. उनकी दखल से देश के एयर डिफेंस प्लांस में बदलाव लाए गए. अब अगले दशक तक एयर डिफेंस सिस्टम्स की खरीद पर देश के करदाताओं का 49,300 करोड़ रुपये बचने की उम्मीद है.

वह लंबे समय से पैनक्रियाटिक कैंसर से जूझ रहे थे. काफी समय से उनकी हालत नाजुक बनी हुई थी, बावजूद इसके वो काम से दूर नहीं हुए और आखिर तक पद पर बने रहे और जनता की सेवा करते रहे. उनकी सादगी और मृदुल स्वभाव ने हमेशा लोगों का दिल जीता. यही वजह थी कि भाजपा के साथ उन्हें दूसरे दलों के नेता भी पसंद करते थे.

पर्रीकर अपनी सादगी के लिए जाने जाते थे. वो हवाई चप्पल और हॉफशर्ट पहना करते थे.उनके ऑई.ऑईटियन मित्र बकुल देसाई याद करते हैं कि जब पहली बार 1978 में वह कॉलेज पहुंचे थे तब पर्रिकर ने उन्हें रैगिंग से बचाया था और तभी दोनों में दोस्ती हो गई थी. देसाई बताते हैं कि पर्रिकर नियमों को लेकर इतने सख्त थे कि एक बार उनके रिश्तेदार ने परिसर से फूल तोड़ा तो पर्रिकर ने खुद पर ही फाइन लगा लिया था. 

सूटर तेजस्वनी सावंत को इस बात का मलाल रह गया कि 'पर्रीकर-सर' को समय रहते ठीक से धन्यवाद ! भी न कह सकीं; 

यह वह समय था जब छोटी सी तेजस्विनी सावंत को बहुत कम लोग जानते थे और जर्मनी में विश्व शूटिंग चैम्पियनशिप में हिस्सा लेने के लिये उन्हें तत्काल आर्थिक मदद की जरूरत थी. ऐसे वक्त में गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर उनके लिये उम्मीद की किरण बनकर आये थे. महाराष्ट्र के कोल्हापुर से आने वाली शूटर तेजस्विनी सावंत ने कहा कि इस मदद से वह न सिर्फ 2005 की प्रतियोगिता में हिस्सा ले पाईं बल्कि यह मौका उनके कॅरियर में निर्णायक मोड़ बना क्योंकि इसके बाद तो उन्होंने नयी-नयी ऊंचाइयां छुईं.

मुख्यमंत्री होने के बावजूद उन्होंने कई सालों तक सीएम हाउस का इस्तेमाल नहीं किया था. कितनी दफा तो वह सरकारी गाड़ी छोड़ अपने लंबरेटा स्कूटर से मुख्यमंत्री कार्यालय के लिए निकल जाया करते थे. एक साक्षात्कार मे उन्होने कहा था.

मैं अपनी ज़िंदगी के अंतिम 10 साल ख़ुद के लिए जीना चाहता हूं. मैंने राज्य को काफ़ी कुछ वापस दिया है. मैं इस कार्यकाल के बाद मैं चुनाव लड़ने या चुनाव का हिस्सा नहीं बनूंगा, चाहे पार्टी की ओर से कितना ही दबाव आए." उन्हे क्या पता कि वो दस साल अब कभी नही आएंगे.

वो आज भी अपने अनुयायियों के आदर्श हैं, गोवा के नवनियुक्त मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने अपने प्रथम उद्बोधन मे कहा," मै आज जो कुछ भी हूं, स्वर्गीय पर्रीकर की वजह से ही हूं.

कदाचित् वो कह रहे हैं:

तन मेरा था,

मन मेरा था,

श्वांस की भी,

अब आस नही,

हे! भारत-माता,

तेरा कण-कण मोती है,

इस कंकड़ पर शोक करना.

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