छत्तीसगढ़ सरकार ने नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी के संरक्षण-संवर्धन की दिशा में अभिनव पहल की है. रायपुर जिले में अक्षय चक्र कृषि के मॉडल को अपनाया जा रहा है. खेती के इस मॉडल से किसान अब अपनी बाड़ियों और खेतों में न केवल 12 महीने भरपूर हरी-भरी सस्ती जैविक सब्जियां उगा सकेंगे, बल्कि हर दिन किसानों के रोजगार की गारंटी भी सुनिश्चित की जाएगी. गांव के जरूरतमंद, लघु और सीमांत किसानों का चयन करने को कहा गया है, ताकि मनरेगा से कन्वर्जेंस कर उनकी बाड़ी और खेतों में यह अक्षय चक्र बनवाया जा सके. जिला प्रशासन के अधिकारियों ने आगामी मंगलवार तक ऐसे चयनित किसानों की बाड़ी का नक्शा-खसरा जिला पंचायत में जमा करने को कहा है ताकि अक्षय चक्र का निर्माण प्रारंभ किया जा सके.

अधिकारियों ने बताया कि गौठान बनाने के लिए जिले में प्रथम चरण में 81 गांवों का चयन किया गया है. इन गौठानों में भी अक्षय चक्र बनाया जाएगा, ताकि ग्रामीणों के साथ-साथ स्कूल और आंगनबाड़ी के बच्चों को भी पौष्टिकता से भरपूर जैविक सब्जियां उपलब्ध कराई जा सके. यह कुपोषण को दूर करने में अहम होंगी. कलेक्टर ने शुक्रवार को अक्षय चक्र कृषि को अपनाकर प्रगतिशील किसान बने चमराराम और साथियों को सम्मानित किया. क्या है अक्षय चक्र खेती कलेक्टर डॉ. बसवराजू एस ने बताया कि राज्य सरकार की घुरवा और बाड़ी की अवधारणा को अपने में समाहित अक्षय चक्र कृषि मॉडल में एक ही समय में एक या दो नहीं, बल्कि 24 अलग-अलग प्रकार की सब्जियां 12 महीने 10 डिसमिल के छोटे से क्षेत्र में उगाई जाती है.

इस मॉडल में किसानों की बाड़ी या खेत में जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो, वहां जमीन में 66 बाई 66 फीट (10 डिसमिल) में एक अष्टभुज गोलाकार चक्र बनाकर आठ खानों में बांटा जाता है. इसके इनर चक्र में आठ खण्ड होते हैं, जिसमें पालक, लाल भाजी, मेथी, चौलाई सहित विविध प्रकार की भाजियां लगाई जा सकती हैं. इसके आउटर लेयर में आठ खण्ड होते हैं जिनमें टमाटर, प्याज, बैंगन, भिण्डी, लौकी, करेला, कुम्हड़ा, मिर्ची आदि लगाई जा सकती हैं. चक्र के किनारों में पपीता और केला के पौधें लगाकर फल भी प्राप्त किए जा सकते हैं. चक्र के हर भाग की एक फीट खुदाई कर मिट्टी बाहर निकाली जाती है. इस चक्र को बनाने के किए किसानों को मनरेगा के तहत रोजगार भी मुहैया होता है. गड्डों में मिट्टी के बदले घुरवा के कचरे का तीन इंच लेयर बिछाया जाता है. इसके ऊपर दो इंच मिट्टी डाली जाती है. इसे तीन बार करते है. चक्र के बीचोबीच 5बाई5 फीट का गड्डा भी बनाया जाता है.

जिसे अक्षय कुण्ड कहा जाता है. इसमें गौमूत्र, गोबर, माढ़ और पानी के मिश्रण से अक्षय जल तैयार किया जाता है, जिससे अक्षय चक्र में सिंचाई की जाती है. तीन महीने में फसल हो जाएगी तैयार करीब 90 से 100 दिनों में चक्र में फसल तैयार हो जाती है और किसानों को खुद अपनी बाड़ी से ताजी सब्जियां और आय प्राप्त होने लगती है. अक्षय चक्र में भूमि का ट्रीटमेंट तो होता ही है, किसान बिना रासायनिक खाद के उन्नत फसल भी ले पाते हैं. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह भी है कि चक्र के हर भाग में एक एकड़ जमीन के लिए उत्कृष्ट जैविक खाद भी तैयार हो जाती है जिसे किसान अपने खेतों में धान आदि फसलों के लिए उपयोग कर सकते हैं. इस चक्र को अपनाने से किसानों की आमदनी तो बेहतर होगी ही साथ ही बिना रासायनिक खाद के इस्तेमाल से जैविक उत्पाद प्राप्त किए जा सकेंगे. - डॉ. बसवराजू एस, कलेक्टर, रायपुर

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