खुले में शौच और गंदगी की समस्या सिर्फ ग्रामीण भारत की समस्या नहीं है, बल्कि शहरी इलाकों में भी खुले में शौच की समस्या देखी जा सकती है. इसकी सबसे बड़ी वजह शहरों में बढ़ती आबादी के अनुपात में सार्वजनिक शौचालयों का न होना है. शहरों में खासकर स्लम एरिया में सार्वजनिक शौचालय या तो होते ही नहीं हैं या फिर अच्छी हालत में नहीं होते हैं. इससे लोगों को शौच के लिए खुले में जाना पड़ता है और गंदगी से बीमारी का प्रकोप फैलता है सो अलग.

इस समस्या को देखते गहुए पुणे के स्वच्छता उद्यमी उल्का सदालकर और राजीव खेड़ा ने शौच के लिए कई विकल्प मुहैया कराने की दिशा में काम करने की कोशिश की है. वे इस काम को बीते 13 सालों से कर रहे हैं. उन्होंने 2016 में पुणे महानगरपालिका (PMC) के साथ मिलकर महिलाओं के लिए मोबाइल टॉयलेट्स विकसित किए थे. इस पहल का नाम रखा था ‘Ti for Toilet’ (ती को मराठी में महिलाओं को संबोधित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.) 

इन दोनों युवा उद्यमियों ने अपनी कंपनी 'सारा प्लास्ट' के तहत 3S नाम से एक आइडिया विकसित किया. एनडीटीवी को दिए एक इंटरव्यू में राजीव कहते हैं, 'हम काफी लंबे समय से स्वच्छता के व्यवसाय में हैं इसलिए हम हमेशा नई तकनीक और खोजों की तरफ देखते रहते हैं. हमारी एक रिसर्च में हमने देखा कि एक संस्थान ने बस में टॉयलेट बनाकर उसका सही इस्तेमाल किया. हमने सोचा कि पुणे जैसे शहर में न जाने कितनी बसें कबाड़ में पड़ी हुई हैं तो उनका इस्तेमाल शौचालय बनाने में क्यों नहीं किया जा सकता?' 

इसके बाद 13 साल या उससे ज्यादा पुरानी बसों को महिलाओं के लिए शौचालय में तब्दील कर दिया गया. अभी तक पूरे शहर में ऐसी 11 बसों को शौचालय में बदला गया है. इन बसों को पार्क, टूरिस्ट प्लेस, व्यस्त जगहों और स्लम इलाकों में खड़ा किया गया है. खेड़ा आगे कहते हैं, 'हमारे पास बसों को कहीं भी ले जाने की आजादी है, लेकिन अगर हम बस को किसी एक खास जगह पर लगा देते हैं तो महिलाओं को बार बार बसों को खोजना नहीं पड़ेगा. इससे वे अपने जान पहचान के लोगों को भी बस के बारे में बता सकती हैं.' 

पुणे शहर में हर रोज औसतन 150 महिलाएं इस बस का इस्तेमाल करती हैं. पुणे महानगरपालिका इन बसों के लिए पार्किंग स्थान उपलब्ध कराती है. इसके साथ ही कई कॉर्पोरेट संस्थानों ने नैगम सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत संसाधन उपलब्ध कराए हैं. बसों में भारतीय और पाश्चात्य दोनों शैलियों के शौचालय लगे हुए हैं.. इसके साथ ही बसों की छत पर सोलर पैनल लगाया गया है जिसकी मदद से वाई फाई को चलाया जाता है. बस में डायपर्स, सैनिटरी नैपकिन डिस्पेंसर के साथ-साथ वॉशबेसिन भी लगा हुआ है. हर बार शौच के लिए लोगों से सिर्फ 5 रुपये लिए जाते हैं इस तरह से बस को चलाने का पूरा खर्च आसानी से निकल जाता है.

वर्तमान स्थिति के बारे में बात करते हुए सदालकर ने  बताया, 'हम यूनिललीवर, किंबरले क्लार्क और फायररमेनिक के साथ काम कर रहे हैं ताकि हम अपने बिजनेस को और आगे ले जा सकें. हमने इन कंपनियों से मार्केटिंग से लेकर, ब्रैंडिंग और ह्यूमन रिसोर्स पर काफीी काम किया है और काफी कुछ सीखा भी है.'

साभार: yourstory Dot com  हिंदी 

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