महर्षि वाल्मीकि ने संस्कृत में रामायण रचना की थी. रामायण एक महाकाव्य है .संस्कृत में प्रथम महावाक्य की रचना करने के कारण वाल्मीकि आदिकवि कहलाए.

वाल्मीकि जी के जन्म का कोई विशेष प्रमाण नहीं प्राप्त होता है .वाल्मिकी ब्राह्मण नहीं थे .एक बार वाल्मीकि एक क्रौंच(सारस) पक्षी के जोड़े निहार रहे थे .यह जोड़ा प्रेम में लीन था ,तभी उन्होंने देखा एक बहेलिये ने इस प्रेम में लीन जोड़े मे से नर पक्षी को मार दिया, जिस कारण दुखी होकर मादा पक्षी विलाप करने लगी. इस रुदन को सुनकर वाल्मीकि जी की करुणा जागृत हो गई और इस दुख की अवस्था में उनके मुख से स्वयं ही यह प्रथम श्लोक निकल पड़ा –

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः.

यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥

श्लोक का अर्थ है -” हे दुष्ट, तुमने प्रेम मे मग्न क्रौंच पक्षी को मारा है, जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं हो पायेगी और तुझे भी वियोग झेलना पड़ेगा”

रामचरित्र मानस के अनुसार राम वाल्मीकि के आश्रम में आए थे और जब राम ने अपनी पत्नी सीता का परित्याग करा था तब सीता जी को महर्षि वाल्मीकि ने अपने आश्रम में आश्रय दिया था. वाल्मीकि जी को श्री राम जी के जीवन में घटित प्रत्येक घटना का पहले से ही ज्ञान था. वाल्मीकि जी ने भगवान विष्णु को दिये श्राप को आधार मान कर अपने महाकाव्य “रामायण” की रचना की.वाल्मीकि जी के कुछ अनमोल विचार आपके सामने इस प्रकार से हैं जो आपके जीवन को बदल सकते हैं.

1* माता-पिता की सेवा और उनकी आज्ञा का पालन करने जैसा दूसरा धर्म कोई भी नहीं है.

2* जीवन में सदैव सुख ही मिलता रहे यह बहुत दुर्लभ है.

3* दुखी व्यक्ति प्रत्येक पाप कर सकता है.

4* जो लोग गलत रास्ते पर चलते है उन्हें कभी भी सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं होता है.

5* शूरवीर व्यक्ति जल विहीन बादल की तरह व्यर्थ गरजते नहीं है.

6* जननी और जन्मभूमि दोनों ही स्वर्ग से बढ़कर है.

7* अधिक संघर्ष होने से चंदन में भी आग उत्पन्न हो जाती है ठीक उसी प्रकार अवज्ञा करने पर ज्ञानी के हृदय में भी क्रोध        उत्पन्न हो जाता है.

8* यदि आप के चरित्र में कमी है तो आप कभी भी महान नहीं बन सकते.

9* भाग्य की कल्पना मूर्ख व्यक्ति ही करते हैं और जो व्यक्ति भाग्य पर निर्भर होते हैं वह अपना नाश स्वयं कर लेते हैं.

10* मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन अहंकार है वह सोने के हार को भी मिट्टी में बदल देता है.

11* किसी से अधिक प्रेम ना करो और ना ही प्रेम का अभाव होने दो क्योंकि यह है दोनों ही महान दोष है इसलिए मध्यम    स्थिति पर ही दृष्टि निश्चित करो.

12* क्रोध मनुष्य के गुणों का विनाश कर देता है इसीलिए हमेशा क्रोध से बचने का प्रयत्न करना चाहिए.

13* हितकर किंतु अप्रिय वचन कहने वाले और सुनने वाले दोनों ही दुर्लभ होते हैं.

14* संसार में ऐसे बहुत कम व्यक्ति है जो भले ही कठोर हो किंतु हित की बात करते हो.

15* इस संसार में दुर्लभ नाम की कोई चीज नहीं होती अगर आप उत्साह का साथ ना छोड़े तो.

16* ईश्वर ने आपको जो कुछ दिया है आपको उसके लिए ईश्वर के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए, इस विषय में आपको कृतघ्न नहीं होना चाहिए.

17* माया के दो भेद है विद्या और अविद्या.

18* मन कभी भी इच्छित वस्तु को प्राप्त करने के पश्चात भी संतुष्ट नहीं होता है, ठीक उसी प्रकार जैसे एक टूटे हुए बर्तन में चाहे कितना भी पानी भरे वह कभी नहीं भरता.

19* किसी के प्रति गलत भावना रखने से आपका मन स्वयं ही मैंला हो जाता है.

20* दुख और सुख आपके पास बिन बुलाए ही आ जाते हैं.

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