जयपुर. कोई पिता जब अपने बच्चों के सपनों को पूरा करने के लिए अपना सबकुछ न्यौछावर कर देता है और बदले में बच्चे भी उसकी अपेक्षाओं पर खरे उतरते हैं तो दोनों की ही खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता है. कुछ ऐसी ही कहानी है राजस्थान के पिछड़े माने जाने वाले चूरू जिले से निकली नवोदित क्रिकेटर प्रिया पूनिया और उसके पिता सुरेन्द्र पूनिया की. न्यूजीलैंड के खिलाफ खेलने वाली भारतीय महिला क्रिकेट टीम में शामिल हुई प्रिया के लिए उसके पिता सुरेन्द्र पूनिया ने वो सबकुछ किया जो वह चाहती थी. जिसके बूते वह क्रिकेट में नाम कमा सकती थी. सर्वे ऑफ इंडिया में हैड क्लर्क के पद पर कार्यरत सुरेन्द्र पूनिया ने बेटी को क्रिकेटर बनाने के लिए अपनी उम्रभर की जमा पूंजी मकान और जमीन बेचकर राजधानी जयपुर में प्रक्टिस के लिए खुद का ग्राउंड तैयार करवा डाला.

बेटी प्रिया ने भी पिता की इस अथक मेहनत और सपने का बेकार नहीं जाने दिया. तीन साल पहले भी इंडिया-ए की टीम में न्यूजीलैंड के खिलाफ खेल चुकी बेटी प्रिया ने जब पिता को भारतीय महिला क्रिकेट टीम में चयनित होकर दिखाया था गर्व से उनका सीना चौड़ा हो गया. प्रिया ने टीम के चयन के बाद इसका पूरा श्रेय भी पिता को ही दिया. बकौल प्रिया जो कुछ वह सबकुछ पापा की बदौलत है. चूरू के तारानगर के जनाऊ खारी गांव के सुरेन्द्र पूनिया के घर 6 अगस्त, 1996 में जन्मी प्रिया को यूं तो उसके पिता ने 12 वर्ष की उम्र 2008 में बैडमिंटन का बल्ला थमाया था, लेकिन उसमें उसका मन नहीं रमा.

इस पर पिता ने बेटी की इच्छा को तज्वजो देते हुए उसे जयपुर की सुराणा क्रिकेट एकेडमी में दाखिला दिला दिया. लेकिन जयपुर में परिस्थितियां माकूल नहीं देखकर वो बेटी को लेकर दिल्ली चले गए और खुद ने भी वहीं ट्रांसफर ले लिया. वहां वेस्ट दिल्ली द्वारका में बेटी को क्रिकेट की प्रक्टिस करवाई. लेकिन सेंटर पिच पर प्रक्टिस की डिमांड को देखते हुए सुरेन्द्र पूनिया वापस जयपुर आ गए. चूंकि बाहर या किराए पर सेंटर पिच पर प्रक्टिस काफी महंगी पड़ती है, लिहाजा सुरेन्द्र पूनिया ने जयपुर का अपना मकान और जमीन का कुछ हिस्सा बेचकर 2015 में जयपुर के ही टोडी हरमाड़ा में डेढ़ बीघा जमीन खरीदी.

वहां क्रिकेट का ग्राउंड तैयार करवाया. खुद के ग्राउंड पर सेंटर पिच तैयार करवाकर बेटी को प्रैक्टिस करवाना शुरू किया. उसके बाद बेटी प्रिया अब टूर्नामेंट में ही बाहर जाती है, अन्थथा अपने पिता के सपनों के पिच पर ही प्रैक्टिस करती है. उसी प्रक्टिस का नतीजा है कि आज वह इस मुकाम पर है. बकौल सुरेन्द्र पूनिया बच्चों की प्रगति देखकर सारे कष्ट भूल जाते हैं. अभी उसे और आगे बढ़ना है.

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