मनुष्य जीवन में विलंब से होने वाले एवं उचित समय के उपरांत होने वाले कार्य अक्सर अपनी प्रासंगिकता खो देते हैं, जिससे मन में विषाद और निराशा व्याप्त होती है. मनुष्य के जीवनकाल में जन्म से लेकर मृत्यु तक यदि प्रत्येक कार्य उचित समय पर हों तो ऐसे व्यक्ति का जीवन सफ़ल और सानन्द माना जाता है किन्तु कई बार व्यक्ति की जन्मपत्रिका में कुछ ऐसी ग्रह स्थितियां बन जाती हैं, जिनसे उसका प्रत्येक कार्य विलंब एवं उचित समय व्यतीत हो जाने के उपरांत होता है. ज्योतिर्विद पं. दयानन्द शास्त्री के अनुसार ज्योतिष एक सत्य है जो पहले से निर्धारित है और सत्य कभी बदल नहीं सकता.

अगर आप उसे स्वीकार नहीं करते तो उसे नकारा भी नहीं जा सकता लेकिन उनके प्रभाव को कम या ज्यादा करके काफी हद तक बचा अवश्य जा सकता है. ब्रह्मांड में होने वाली भौगोलिक घटनाओं का महत्व और सटीक वर्णन ज्योतिष में मिलता है. हिंदू धर्मशाास्त्रों में बहुत सारे ऐसे नियम बताए गए हैं जिनका रोजमर्रा के जीवन में बहुत महत्व है. ये उपाय अगर अपने ईष्ट का स्मरण कर भक्ति भाव से पूजन और नियमितता से किए जाएं तो अवश्य ही धन संकट का समाधान होता है.

ज्योतिष शास्त्र में सभी राशियों में ग्रह-नक्षत्र की अलग-अलग स्थिति होती है. ज्योतिष शास्त्र में हर राशि के लिए समस्याओं से बचने के लिए कुछ खास उपाय बताए गए हैं. आइए समझने का प्रयास करते हैं कि किसी जातक की जन्म पत्रिका में वे कौन सी ऐसी ग्रहस्थितियां व ग्रह होते हैं जो कार्यों में देरी (विलंब) के लिए उत्तरदायी होते हैं …

जातक के कार्यों में विलंब के लिए केवल एक ही ग्रह सर्वाधिक उत्तरदायी होता है, वह है- शनि. शनि को “शनैश्चर” भी कहा जाता है. “शनैश्चर” अर्थात् शनै: शनै: चलने वाला, धीमे चलने वाला. जब शनि की दृष्टि या प्रभाव किसी भाव पर पड़ता है तो उस भाव से सम्बन्धित कार्यों में विलम्ब होता है. उदाहरणार्थ यदि शनि की दृष्टि सप्तम भाव या सप्तमेश पर हो तो जातक का विवाह विलम्ब से होता है.

* यदि शनि की दृष्टि या प्रभाव दशम भाव पर पड़ता है तो जातक को आजीविका अत्यन्त विलम्ब से प्राप्त होती है.

* शनि जब पंचम भाव, पंचमेश व शुक्र पर अपना दृष्टि प्रभाव डालते हैं तो जातक को सन्तान सुख देर से प्राप्त होता है.

*ऐसे ही जब शनि का दुष्प्रभाव आय व धन भाव पड़ता है तब जातक को अपने परिश्रम का लाभ विलम्ब से प्राप्त होता है व धन संचय करने में सफ़ल नहीं हो पाता.

*चतुर्थ भाव, चतुर्थेश व मंगल पर जब शनि की दृष्टि या प्रभाव होता है तब जातक को स्वयं का मकान एवं वाहन प्राप्त होने में विलम्ब होता है. *यदि जन्मपत्रिका में इन भावों और भावाधिपतियों पर शनि का दुष्प्रभाव हो तो शीघ्र शनि की वैदिक शान्ति कर कार्यों में होने वाले विलम्ब को समाप्त कर लाभ प्राप्त किया जा सकता है.

विवाह में देरी के ज्योतिषीय कारण :

* जब जन्म कुंडली के सप्तम भाव में बुध और शुक्र दोनों हो तो विवाह की बातें होती रहती हैं, लेकिन विवाह काफी समय के बाद होता है.

* जब कुण्डली के चौथा भाव या लग्न भाव में मंगल हो और सप्तम भाव में शनि हो तो व्यक्ति की रुचि शादी में नहीं होती है.

* यदि जातक के सप्तम भाव में शनि और गुरु हो तो शादी देर होती है. यदि चंद्र से सप्तम में गुरु हो तो शादी देर से होती है.

*चंद्र की राशि कर्क से गुरु सप्तम हो तो विवाह में बाधाएं आती हैं.

*जब कुंडली के सप्तम भाव में त्रिक भाव का स्वामी हो, कोई शुभ ग्रह योगकारक नहीं हो तो विवाह में देरी होती है.

* जब जन्म कुण्डली में सूर्य, मंगल या बुध लग्न या लग्न के स्वामी पर दृष्टि डालते हों और गुरु बारहवें भाव में बैठा हो तो व्यक्ति में आध्यात्मिकता अधिक होने से विवाह में देरी होती है.

* जब लग्न (प्रथम) भाव में, सप्तम भाव में और बारहवें भाव में गुरु या शुभ ग्रह योग कारक न हो और चंद्रमा कमजोर हो तो विवाह में बाधाएं आती हैं.

*यदि महिला की कुंडली में सप्तमेश या सप्तम भाव शनि से पीड़ित हो तो विवाह देर से होता है. राहु की दशा में शादी हो या राहु सप्तम भाव को पीड़ित कर रहा हो तो शादी होकर टूट जाती है.

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