रामबिहारी पाण्डेय. मध्यप्रदेश के सीधी जिले में जंगलों के बीच आज भी एक ऐसा गांव है,जहां 35 सालों से बच्चों की किलकारी नहीं गूँजी. शासन-प्रशासन की तरफ से एक बार पंकज अग्रवाल जिला कलेक्टर के कोशिश के बावजूद भी क्या बूढ़े क्या बुजुर्ग सभी संतान के लिए तरसते हैं. मुख्यालय से लगभग 90 किलोमीटर दूर भुइमाड के पास बीहड़ जंगलों के बीच बसे छोटे से गांव हर्रई की आबादी 400 के आसपास है. उनमें एक जाति खैरवार है जो अपने घर के आँगन में बच्चों की किलकारी के लिए 35 सालों से तरस रहे हैं.

गांव में खैरवार जाति के लगभग 40 परिवार रहते हैं. इनमें सबसे बुजुर्ग जिसकी उम्र 70 साल है. उन्होंने बताया कि यहाँ पीपल में ग्राम देवता जिसे स्थानीय भाषा मे अंगारा मोती कहते हैं, वह नाराज हो गए है. पीपल की जड़ में बकरा, मुर्गा का खूनने से देवता नाराज हैं. यही वजह है कि क्या बूढ़ा, क्या जवान किसी को बच्चा नहीं हुआ. जबकि कुछ साल पहले जिला कलेक्टर पंकज अग्रवाल द्वारा गांव में कैंप लगाकर ओर सीधी में एक निजी नर्सिंग होम में जांच के अलावा भोपाल, जबलपुर, इंदौर में इनकी जांच और इलाज की करवाई की गई लेकिन जांच में ऐसे कोई तथ्य निकल सामने नहीं आया, जिससे संतान ना होने की कमी पकड़ी जा सके.

इन लोगों का यह भी कहना है कि गांव छोड़ कर किसी अन्य जगह जाते हैं तो बच्चे होने लगते हैं. भुइमाड इलाके का यह गांव आज भी अंधविश्वास के जाल में इस कदर फंसे हुए हैं कि इनका विश्वास है कि घर में बंदूक रख लेने से बच्चे होने लगते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि 2001 में तत्कालीन कलेक्टर पंकज अग्रवाल द्वारा एक परिवार को बंदूक आवंटन की गई थी तो आज उस घर में बच्चे पैदा हुए हैं.सरकार बंदूक रखने में हमारी मदद करे तो फिर से हमारे घर में किलकारी गूँजने लगेगी, लेकिन राजनैतिक और प्रशासनिक अमले द्वारा अब तक कोई सहायता नही दी गई है जिससे उस गावँ में फिर से बच्चों की किलकारी सुनाई देने लगे.

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