टिप्पणी. पिछले कुछ वर्षों से मीडिया की एक हेडलाइन हमेशा चौकाती है, प्रधानमंत्री मोदी ने बिना नाम लिए हमला किया. कभी यह पड़ोसी देश के लिए होता है तो कभी विपक्षी नेता के लिए. समझ में नहीं आता, मीडिया को बिना नाम के हमला करना इतना पसंद क्यों है? हाल में ही यह हैडलाइन फिर से उजागर हुई जब प्रधानमंत्री ने झूठे आंकड़े एके-47 से निकलते हुए बताया. जब झूठे आंकड़े की बात आती है, तब एक ही चेहरा ध्यान आता है. अभी बहुत दिन नहीं बीते हैं जब प्रधानमंत्री ने कुछ ही दिनों में 2014 की अर्थव्यवस्था का एक वाकया बार-बार दुहराया था. मोदी अनुसार जब उनकी सरकार सत्ता में आयी तब नयी सरकार को अर्थव्यवस्था की भयावह स्थिति नहीं पता थी.

बकौल मोदी यह उन लोगों के अनुमान से बहुत बदतर थी, इतनी बदतर कि यदि वे उस समय की अर्थव्यवस्था पर श्वेत-पत्र जारी कर देते तो देश बर्बाद हो जाता, लोग शर्म से झुक जाते. किसी भी बात की तुलना किसी हथियार से कैसे की जाती है, यह इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है. वैसे भी जिन लोगों को देशभक्ति का पाठ पढ़ाने के लिए विश्वविद्यालयों में टैंक रखने की जरूरत महसूस होती है, उनके लिए हरेक तुलना हथियार से करना जरूरी भी है. पिछले सप्ताह मझोले और छोटे उद्योगों के सम्मलेन में प्रधानमंत्री मोदी ने बहुत कुछ कहा, पर महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उनके अनुसार वर्ष 2014 में अपने देश की अर्थव्यवस्था विश्व में 9वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी.

जरा सोचिये जिस अर्थव्यवस्था की हालत ऐसी हो, जिसपर श्वेत-पत्र जारी करते ही पूरा देश बर्बाद हो जाता, वैसी अर्थव्यवस्था दुनिया में 9वें स्थान पर थी, तब अगर आज चौथे या पांचवें स्थान पर है, तब गर्व करने वाली क्या बात है. आज की अर्थव्यवस्था की हालत तो सभी जानते हैं, पर मोदी के अनुसार तो स्वर्णाक्षरों में लिखा जाने वाला समय है. अभी हाल में जब रिजर्व बैक और सरकार में तनातनी चल रही थी तब आईएमएफ ने ऐतराज जताया था.

इसका मतलब आईएमएफ और विश्व बैंक को हरेक देश के अर्थव्यवस्था की अंदरूनी जानकारी रहती है. ऐसे में, पूरा देश यह अवश्य जानना चाहेगा कि विश्व बैंक या आईएमएफ की ऐसी कौन सी रिपोर्ट है जो प्रधानमंत्री मोदी के कहे अनुसार वर्ष 2014 में देश की अर्थव्यवस्था की उस भयानक स्थिति को उजागर करती है? यदि ऐसा नहीं है, तब प्रधानमंत्री जी ने इस सभी संस्थाओं पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है. प्रधानमंत्री के अनुसार गांधी जी और सरदार पटेल जैसे सरीखे नेताओं को विपक्ष ने भुला दिया. शायद उनको गलतफहमी है कि यदि स्वच्छ भारत अभियान नहीं होता तब गांधी जी को कोई याद भी नहीं करता और सरदार पटेल को तो हम इतना भूल चुके थे (ऐसा प्रधानमंत्री समझते हैं) कि इनका नाम याद दिलाने के लिए दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति बनवानी पड़ी.

कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी के सबसे प्रिय नेता ही गांधी जी और सरदार पटेल हैं, पर क्या कभी किसी भी नयी योजना का नाम, या किसी पुरानी योजना का नया नाम आपने इन नेताओं के नाम पर रखा गया हो, यह देखा है? हां, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी बाजपेयी, प्रधानमंत्री इत्यादि के नाम पर योजनायें तो हैं. जब प्रधानमंत्री सरदार पटेल की सबसे ऊंची मूर्ति पर नतमस्तक हो रहे थे, तब हमारा पड़ोसी देश चीन कोई मूर्ति नहीं बना रहा था, बल्कि बीजिंग में दुनिया का सबसे ऊंचा और सबसे बड़ा एयर प्यूरीफ़ायर स्थापित कर रहा था, जिससे वहां के निवासियों को वायु प्रदूषण से राहत मिल सके. प्रधानमंत्री शायद ही कभी प्रदूषण के बारे में बोलते हैं, हां, क्लाइमेट चेंज के बारे में जरूर बार-बार बोलते रहते हैं. पर यदि आप वैज्ञानिक नहीं हैं, या विज्ञान के विद्यार्थी नहीं रहे हैं तब भी यह आसानी से समझ सकते हैं कि बिना वायु प्रदूषण को रोके क्लाइमेट चेंज को रोकने के लिए कुछ नहीं कर सकते हैं, सिवाय भाषण देने के. मोदी नारे भी खूब गढ़ते हैं. सबका साथ-सबका विकास तो बार बार कहते हैं.

पर इस नारे पर शायद उन्हें ही भरोसा नहीं है, यदि भरोसा होता तब लड़की बचाओ-लड़की पढाओ का नारा देने की जरूरत ही नहीं पड़ती. सबका विकास में तो लडकियां शामिल हैं ही. लड़कियों के बारे में उनके सहयोगी समय-समय पर जो प्रवचन देते हैं उस पर प्रधानमंत्री मौन रह कर अपनी सहमति अवश्य जता देते हैं. हाल में ही उनकी सहयोगी ने साबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश के विरुद्ध एक निर्लज्ज बयान दिया था, प्रधानमंत्री चुप रहे. उनकी सहयोगी से इतना तो जरूर पूछा जान चाहिए था कि संसद में महिलाओं के प्रवेश पर क्या राय रखती हैं, मोदी उसे पहले दिन ही मंदिर का दर्जा दे चुके हैं.

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