इनदिनों. एमपी के प्रादेशिक चुनाव में टिकट के लिए सियासी घमासान जारी है. एक ओर कई नेता किसी भी हद पर जाकर अपने रिश्तेदारों को टिकट दिलाना चाहते हैं तो दूसरी ओर सिद्धान्त के नाम से केन्द्रीय भाजपा ऐस रिश्तेदारों की टिकट पर कैंची चलाना चाह रही थी, लेकिन सियासी सयानों का मानना है कि यदि केन्द्रीय भाजपा, रिश्तेदारों के टिकट काटने में कामयाब रही तो जीत तो भाजपा से दूर होती ही जाएगी, बगावत की बड़ी समस्या और खड़ी हो जाएगी!

इन्हीं सिद्धान्त की लड़ाई में करीब तीन दर्जन टिकट उलझे हुए थे. हालांकि, खबर है कि सिद्धान्तों को ताक में रख कर नई रणनीति के तहत रिश्तेदारों को भी राहत मिलने लगी है? 

भाजपा ने मध्यप्रदेश चुनाव के लिए तीसरी सूची जारी की हैं, जिसमें 32 उम्मीदवारों के नाम हैं. भाजपा अब तक 215 उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर चुकी है.

कैलाश विजयवर्गीय के बेटे आकाश विजयवर्गीय को इंदौर- 3 से टिकट दे दिया गया है तो वरिष्ठ नेता और पूर्व सीएम बाबूलाल गौर की रिश्तेदार कृष्णा गौर को गोविंदपुरा से टिकट दिया गया है. याद रहे, अगर कृष्णा गौर को टिकट नहीं मिलता तो बाबूलाल गौर बगावत की पूरी तैयारी करके बैठे थे!

दरअसल, यूपी विधानसभा चुनाव के समय भी ऐसे ही सैद्धान्तिक हालात बने थे, किन्तु बाद में वहां भी सिद्धान्त ठंडे बस्ते में डाल दिए गए थे. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि नेताओं के रिश्तेदारों को टिकट नहीं दिया जाता तो ताजा कर्नाटक उपचुनाव में भाजपा को एक सीट भी नहीं मिलती? इसलिए वंशवाद का सैद्धान्तिक विरोध तो ठीक है, परन्तु इसकी प्रायोगिक कीमत बहुत ज्यादा है!

एमपी में भाजपा की बड़ी परेशानी यह है कि यदि एक रिश्तेदार को टिकट दिया जाता है तो शेष ऐसे नेताओं को समझाना बेहद मुश्किल काम है. एमपी में कई वर्तमान एमएलए को टिकट नहीं दिया जा रहा है. अव्वल तो ये विधायक चाहते हैं कि उन्हें ही मौका दिया जाए और यदि उन्हें मौका नहीं दिया जाता है तो उनके रिश्तेदार को अवसर दिया जाए!

बागी नेताओं के स्वर इसलिए भी बुलंद रहे हैं कि- एक तो, चुनाव एक तरफा नहीं हैं, लिहाजा भाजपा की टिकट कोई जीत की गारंटी नहीं है, और दूसरा- ऐसे बागी नेताओं के लिए कांग्रेस सहित विभिन्न क्षेत्रीय दलों के स्वागत द्वार सटिकट खुले हैं, मतलब... यदि भाजपा अवसर नहीं दे तो ऐसे उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने की उम्मीद ये दल पूरी कर सकते हैं?

दिक्कत यह है कि- वंशवाद के नाम पर कांग्रेस पर निशाना साधने वाली भाजपा खुद भी परिवारवाद की परेशानी के चक्रव्यूह में फंसी है, देखना दिलचस्प होगा कि केन्द्रीय भाजपा इस चक्रव्यूह से बाहर कैसे निकल पाती है?

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