इनदिनों. एमपी, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस का बसपा जैसे क्षेत्रीय दलों के साथ चुनावी समझौता नहीं होने जा रहा है, लेकिन इसको लेकर कांग्रेस परेशान नहीं है, कारण? कांग्रेस को अपनी बढ़ती ताकत का अहसास हो रहा है!

पीएम मोदी सरकार से निराश सामान्य वर्ग जहां कांग्रेस की ओर जाता दिखाई दे रहा है वहीं क्षेत्रीय दलों का गैरहिन्दू मतदाता भी कांग्रेस की तरफ आकर्षित हो रहा है, क्योंकि इन्हें लगने लगा है कि कांग्रेस ही भाजपा को सत्ता से बाहर कर सकती है, क्षेत्रीय दल यह नहीं कर पाएंगे?

यही वजह है कि अगले आम चुनाव में पीएम नरेन्द्र मोदी से मुकाबले के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लगातार आगे बढ़ रहे हैं और ममता, मायावती जैसे क्षेत्रीय नेता इस दौड़ में तेजी से पिछड़ते जा रहे हैं? इसीलिए ये क्षेत्रीय नेता अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस को महागठबंधन में लगातार कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को कम-से-कम सीटें मिलें और राहुल बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाएं! 

अभी जिन तीन प्रमुख राज्यों- एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव होने जा रहे हैं वहां कांग्रेस की भाजपा से सीधी टक्कर है और ज्यादातर सर्वे बता रहे हैं कि कांग्रेस, भाजपा को सत्ता से बाहर कर सकती है? ऐसी स्थिति में यदि बसपा अपनी ताकत से बहुत अधिक सीटों की उम्मीद रखती है तो कांग्रेस, बसपा की मांग क्यों मानेगी? यदि कांग्रेस-बसपा में समझौता होता है तो हो सकता है कि कांग्रेस को कुछ ज्यादा सीटें मिल जाएं और कुछ सीटें बसपा को भी मिलेंगी, लेकिन यदि समझौता नहीं हुआ तो कांग्रेस को तो कुछ खास नुकसान नहीं होना है, बसपा ही घाटे में रहेगी! 

कांग्रेस का ऐसा रूख इसलिए भी है कि जहां क्षेत्रीय दल अपने प्रभाव वाले राज्यों में कांग्रेस को वास्तविक ताकत से भी बहुत कम सीटें देना चाहते हैं, जबकि कांग्रेस के प्रभाव वाले राज्यों में क्षेत्रीय दल अपनी क्षमता से बहुत अधिक सीटों की मांग कर रहे हैं? जैसे यूपी में समझौते के तहत जितनी सीटें क्षेत्रीय दल कांग्रेस को देना चाहते हैं, उनसे कई ज्यादा सीटें तो कांग्रेस अकेले लड़ कर जीत लेगी?

हो सकता है कि सीटों का समझौता नहीं करके कांग्रेस को इस वक्त थोड़ा नुकसान हो लेकिन आगे चल कर कांग्रेस को बड़ा फायदा होगा, क्योंकि देशभर में कांग्रेस के उदासीन पड़े नेटवर्क में अब तेजी से उत्साह बढ़ रहा है, जबकि समझौते में दिए गए क्षेत्रों में कांग्रेस की स्थिति लगातार कमजोर होती जानी थी!

यही नहीं, जैसी कि विभिन्न सर्वे में संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं, यदि कांग्रेस इन राज्यों में कामयाबी का परचम लहराने में कामयाब रही तो उसका असर शेष राज्यों में भी नजर आएगा?

आम चुनाव की तस्वीर साफ है कि मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस में होगा, जब किसी क्षेत्रीय दल की यह स्थिति नहीं है कि वह लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से ज्यादा सीटें ला सके तो राहुल गांधी को चुनौती किस आधार पर मिलेगी? 

याद रहे, किसी भी क्षेत्रीय दल की यह स्थिति तक नहीं है कि वह आम चुनाव में कांग्रेस की 2014 की न्यूनतम प्राप्त 44 सीटों को भी पार कर सके, जबकि कांग्रेस इस बार महज आधा दर्जन राज्यों में ही एक सौ से ज्यादा सीटों का आंकड़ा पार करती नजर आ रही है!

दरअसल, गैरभाजपाई महागठबंधन की सबसे कमजोर कड़ी मायावती ही है? बसपा आम चुनाव से पहले यूपी के अलावा दूसरे राज्यों में पकड़ मजबूत करना चाहती है, ताकि पीएम पद के लिए मायावती की दावेदारी पुख्ता हो सके! कांग्रेस ऐसा अवसर क्यों देगी?

सियासी सारांश यही है कि... कर्नाटक जैसा कोई चमत्कार नहीं होता है तो केन्द्र की सत्ता कांग्रेस या भाजपा के हाथ रहेगी? यदि किसी विशेष परिस्थिति में कोई क्षेत्रीय नेता पीएम बना भी तो ज्यादा समय तक रह नहीं पाएगा!

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