अभिमनोज. प्रेजेंट सीएम शिवराजसिंह के साले साहब संजय सिंह के कांग्रेस में जाने से सियासी भूचाल आ गया है. बीजेपी खेमा इसे तवज्जों नहीं दे रहा है लेकिन पेशानी पर बल पड़ते साफ दिख रहा है. अब बीजेपी कांग्रेस के कुछ खास लेकिन संजय जैसे नाराज लोगों को अपने पाले में लाने की तैयारी कर ली है. अभी आयाराम ग्याराम का खेल लंबा चलने वाला है. सही मायने में तो यह उस खेल का दुहराव है, जो बीजेपी 15 सालों से खेल रही थी. कांग्रेस ने इस बार प्रदेश की कमान कमलनाथ जैसे अनुभवी हाथो में सौप कर बेफ़िक्र हो गई थी. कमलनाथ ने बीजेपी को उसी के तरीके से जवाब देकर परेशानी में डाल दिया है.

बीजेपी में इस समय असन्तोष चरम पर है. अकेले भोपाल की 7 सीटों की बात करें तो बीजेपी सिटिंग विधायक को भी नहीं बदल पाई. गोविंदपुरा सीट पर ताल ठोंक कर खड़े बाबूलाल गौर की जगह दूसरे के नाम पर संदेह बना हुआ है. गौर टिकट कटने और बहू कृष्णा को टिकट नहीं मिल पाने के हालात में कांग्रेस का दामन थाम सकते हैं. लगभग यह हालात पूरे प्रदेश में है.

ध्यान रहे कि दो माह पहले ही कमलनाथ ने कहा दिया था कि 30 विधायक उनके सम्पर्क में है. इससे लगता है अभी कुछ और बड़े नेता कांगेस में आ सकते हैं. वैसे कांग्रेस ने जो पहली 155 लोगों की लिस्ट जारी की है, उसे लेकर कोई असन्तोष फौरी तौर पर नहीं दिखता है. 22 महिलाओं को टिकट देकर भी उसने बताया है कि उन पर भरोसा है. 20 फीसदी युवाओं को भी मौका मिला है.खास बात यह है कि बीजेपी लगातार हल्ला मचा रही यही थी कि दिग्विजय और सिंधिया के झगड़े के कारण लिस्ट जारी नहीं हो पा रही है लेकिन 

सूची जारी होते ही उनका मुँह बन्द हो गया है.

15 सालों में बीजेपी ने कांग्रेस के कई दिग्गजों को अपने साथ ले लिया है. बरसों से बीजेपी के साथ रहे लोगों का भरोसा उठने लगा है और अब वे कांग्रेस के साथ जाने के लिए बेताब हैं. इसके पीछे कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनता दिख रहा है. पद्मा शुक्ला ने कांग्रेस का दामन थाम तो पूर्व विधायक संजय शर्मा भी साथ हो लिए. अब शिवराज सिंह के परिवार में सेंध लगाकर उनके साले संजय सिंह मसानी को ले उड़े. आने वाले दिन भी बीजेपी के लिए भारी पड़ने वाला है. बीजेपी को अभी 50 सीटों पर नाम फाइनल करना है. इस पर भी रार मचने से इनकार नहीं किया जा सकता है. हालांकि कांग्रेस भी तनाव में रहेगी क्योकि उनके यहां भी सेंध लगाने से बीजेपी चुकेगी नहीं. 

यह चुनाव शिवराज सिंह के लिए अग्नि परीक्षा की तरह है. दिल्ली के राजनीतिक सूत्रों की मानें तो बीजेपी हाइकमान भी उनके खिलाफ है. कुछ गलतियां स्वयं शिवराज ने भी की है. वैसे ही जैसे 2003 में दिग्विजय सिंह ने की थी. यह चुनाव एक तरह से 2003 का दुहराव माना जा रहा है. 

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