इनदिनों : मध्यप्रदेश की राजनीति में इतिहास बनने वाले शिवराजसिंह चौहान आज जिस मुसीबत के दौर से गुजर रहे हैं, उसकी कल्पना भी स्वयं शिवराजसिंह ने नहीं की होगी. पूरे कांफिडेंस के साथ जनआशीर्वाद यात्रा में भाजपा की चौथी दफा बार सरकार बनाने की बात करने वाले शिवराजसिंह इस समय खामोशी अख्तियार किए हुए हैं.

 राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि मोदी-शाह शिवराजसिंह को बेदखल करने के लिए मध्यप्रदेश खोने के लिए तैयार हैं लेकिन वे शिवराजसिंह को जीतने का कोई अवसर नहीं देने वाले. इसकी शुरूआत होती है प्रत्याशियों की सूची से जिसके बारे में पहले कहा गया था कि लगभग 60 विधायकों के टिकट काटे जाएंगे और इसकी जद में करीब दर्जन भर मंत्री होंगे लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और लगभग वही चेहरे फीट कर दिए गए जिनको लेकर लम्बे समय से असंतोष का माहौल बना हुआ है. मीडिया में इस बात को प्रचारित किया गया कि टिकट वितरण में शिवराजसिंह को फ्रीहेंड दिया गया और यह भी बताया गया कि मोदी-शाह ने उन पर भरोसा जताया है जबकि स्थितियों का आंकलन करें तो सबकुछ शीशे की तरह साफ है.

शिवराजसिंह 2013 के चुनाव में दो सीटों से चुनाव लड़ा था लेकिन इस बार उनके हिस्से में केवल बुधनी आया है. उन्हें यह टिकट इसलिए दिया गया कि यह उनकी परम्परागत सीट है लेकिन राजनीतिक प्रेक्षकों की मानें तो इस बार शिवराजसिंह के लिए दांव उलटा पड़ सकता है. स्वयं के साले संजय सिंह के कांग्रेस में जाने से उनकी मुसीबत और बढ़ गई है. 

शिवराजसिंह के लिए मुसीबत का एक बड़ा कारण मीडिया के कुछ खास लोगों को मकान और कार उपहार में दिए जाने का मामला ऐसा उछला है कि जो लोग शिवराजसिंह से मोहब्बत करते हैं, वह भी उनके पक्ष में लिखने से बच रहे हैं. उनके पक्ष में लिखने का मतलब आरोप को मान लेना है. पत्रकारों को कार बांटने की बात भले ही झूठी हो लेकिन मकान बांटा गया है जबकि इस पर अभी पाबंदी है. इस तरह बड़ी होशियारी से मीडिया से भी शिवराजसिंह को दूर कर दिया गया है. उनके खास मंत्री रामपालसिंह को टिकट तो मिल गया है लेकिन उनके जीतने की गुंजाईश रत्ती भर है. उनकी बहू के आत्महत्या के बाद जो माहौल बना है, वह भी अभी कायम है. भोपाल से रामेश्वर शर्मा के खिलाफ असंतोष चरम पर है लेकिन उन्हें दुबारा टिकट दे दिया गया है तो कद्दावर मंत्री बिसेन को भी टिकट मिल गई है. उनके बिगड़े बोल के कारण वे जब तब अपनों से बैर मोल लेते रहे हैं. इधर बाबूलाल गौर दम ठोंककर मैदान में हैं.

 संजय सिंह के बाद उनके भी कांग्रेस में जाने की चर्चा गर्म है. गौर साहब इसलिए भी दम ठोंक रहे हैं कि भोपाल प्रवास के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कह दिया था- ‘गौर साहब एक बार और..’ ऊपर जो हमने कहा है कि हाइकमान भी शिवराजसिंह के खिलाफ है, उसकी यह बानगी है. क्योंकि मोदी ने किस अर्थों में गौर साहब से यह कहा, किसकी को नहीं मालूम लेकिन गौर की दमदारी और बढ़ गई है.

यह शीशे की तरह साफ है कि बीते 13 सालों में शिवराजसिंह चौहान बेताज बादशाह बने हुए हैं. इन तेरह सालों में उन्होंने प्रदेश मे रसूख रखने वाले भाजपा नेताओं को दरकिनार किया है जो आने वाले दिनों में सीएम की दावेदारी कर सकते थे. इसमें पहला नाम उमा भारती का है तो क्रम काफी लम्बा है जिसमें बाबूलाल, प्रभात झा, लक्ष्मीकांत शर्मा, राघवजी, कैलाश विजयवर्गीय जैसे अनेक नाम है. यही नहीं, अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर उन्होंने दो बार विधायक बने लोगों को किनारे कर उनके परिवार को टिकट देने की पहल कर दी. इसका पहला उदाहरण विदिशा के मोहरसिंह हैं जिनके स्थान पर उनकी पत्नी को टिकट दिया गया था. कहने के लिए उनके साथ नरेन्द्र सिंह तोमर हैं लेकिन साथ रहने वाले उनके अपने मंत्री नरोत्तम मिश्रा भी उनके दूरी बनाकर चल रहे हैं. हालात यहां तक है कि दोनों एकसाथ मंच भी साझा नहीं कर रहे हैं. ऐसा करते समय शिवराजसिंह यह भूल कर बैठे कि सबने उनका साथ छोड़ दिया और वे अकेले रह गए. इसका प्रत्यक्ष अनुभव प्रदेश की जनता और राजनीति में सक्रिय लोगों ने किया कि वे जनआशीर्वाद यात्रा में पूरे समय अपनी धर्मपत्नी साधनासिंह के साथ अकेले चलते रहे. प्रभात झा के अलावा कोई बड़ा नेता उनके साथ नहीं था.

बीते सालों में शिवराजसिंह ने यह मान लिया था कि प्रदेश में कांग्रेस का कोई वजूद नहीं बचा. लगातार कांग्रेस के दमदार नेताओं को अपने पाले में लाकर कांग्रेस को और कमजोर बना रहे थे. अमित शाह भाजपा के लिए अबकी बार 200 के पार का नारा गढ़ रहे थे तो कांग्रेस अभी नहीं, तो कभी नहीं की रणनीति पर चल रही थी. कमलनाथ को जब प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी गई तो कांग्रेस के भीतर हलचल हुई. भाजपा ने इसे तवज्जो नहीं दिया लेकिन कमलनाथ के पदभार ग्रहण करने में एयरपोर्ट से शिवाजीनगर कांग्रेस कार्यालय आने में लगे सात घंटे से अधिक का सफर और भाजपाध्यक्ष राकेश सिंह की खामोशी से पदभार करने के बाद कई बातें साफ हो गई थी. राहुल गांधी को पप्पू समझने वाले भूल कर बैठे कि वह जिस परिवार से आते हैं, वहां राजनीति बचपन में घुट्टी में पिलाई जाती है. यह तब लोगों को मालूम हुआ जब कमलनाथ ने प्रदेश के नेताओं के जुबान पर ताला डालकर बयानबाजी से रोक दिया. एक अपवादस्वरूप जीतू पटवारी का मामला आया जिसमें उन्होंने कथित रूप से कहा था कि पार्टी गई तेल लेने. बाद में साफ हो गया कि वह भाजपा के बारे में बोल रहे थे. प्रदेश नेताओं की चुप्पी के बाद कांग्रेस खामोशी के साथ सक्रिय होती चली गई. पहली दफा मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने चार कार्यकारी अध्यक्ष बनाये और ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को दायित्व सौंपा गया. यह रणनीति पहले तो लोगों के समझ में ना आयी हो लेकिन यह संघ की तरह जमीन पकडक़र काम करवाने की तैयारी है. कमलनाथ का लम्बा अनुभव कांग्रेस को ना केवल प्रदेश में पुनर्जीवन देगा बल्कि सत्ता भी भाजपा के हाथों से फिसलती दिख रही है. 

कमलनाथ ने वही चाल चली जो शिवराजसिंह 15 सालों से कांग्रेस के साथ चल रहे थे. संजय पाठक को भाजपा में ले आए तो इस चुनाव में पद्मा शुक्ला को टिकट देकर जता दिया कि उनके मोहरे से उन्हें ही पीटेंगे. उधर कांग्रेस से समझौता करने से इंकार करने वाली बसपा की एक बड़ी नेता विद्यावती पटेल ने कांग्रेस में लेकर उनकी टिकट पक्की कर दी. संजय शर्मा को भी कांग्रेस ने टिकट देकर उन पर भरोसा जताया है. सीहोर से रमेश सक्सेना को अलबत्ता कांग्रेस ने साथ नहीं लिया लेकिन गौर साहब कभी भी कांग्रेस के हो सकते हैं. संभव है कि कृष्णा गौर निर्दलीय मैदान में उतरती हैं तो कांग्रेस का सपोर्ट होगा और जीत जाने के बाद कांग्रेस की होंगी कृष्णा. कांग्रेस, राहुल और कमलनाथ की इस रणनीति में ज्योतिरादित्य सिंधिया को मोहरा बनाकर कांग्रेस की तोडऩे की भाजपा की चाल इस बार उलटी पड़ती दिख रही है. दिग्विजयसिंह के इस बयान को लेकर भी भाजपा इशु बनाने की कोशिश करती रही कि उनके कारण कांग्रेस हारती है जबकि राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि दिग्विजयसिंह को कांग्रेस ने किनारे नहीं किया है और ना ही उनकी भूमिका कांग्रेस हाइकमान ने तय की है बल्कि यह स्वयं उनका ही निर्णय है. वे पर्दे के पीछे रहकर कांग्रेस को सत्तासीन होते देखना चाहते हैं. पगंत में संगत की जो मेल-मिलाप दिग्विजयसिंह ने शुरू किया, उसकी परिणिति जीत तक पहुंच सकती है. हाल फिलहाल शिवराजसिंह को उनकी ही पार्टी घेराबंदी कर रही है जबकि कमलनाथ को उनकी पार्टी ने फ्रीहेंड दिया है. संजय अब अपनी आंखों से भाजपा के महाभारत का हाल सुनाने के लिए आए हैं तो कांग्रेस के गुण गाने में उन्हें परहेज नहीं. यह चुनाव 2003 का दोहराव दिखता है और देखना है कि शिवराजसिंह का खत्म होता जादू कब और कैसे वापस आता है और आता है कि भी नहीं.   

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