पलपल संवाददाता, जबलपुर. संस्कारधानी जबलपुर के अर्ध-शहरी सीट से वर्तमान विधायक ने इस बार फिर टिकट पाने में सफलता हासिल कर ली, उन्होंने टिकट पाने के लिए जितनी मेहनत की थी, उसका फल तो उन्हेें मिल ही गया, लेकिन टिकट मिलने के बाद जो मुसीबत उनका इंतजार कर रही थी, इसका अंदाजा शायद ही उन्हें था, तभी तो टिकट की घोषणा के चंद घंटों बाद ही अनुशासित पार्टी माने जाने वाले दल के बड़े नेता, कार्यकर्ता विरोध में एकजुट हो गये.

पार्टी के अंदर विरोध जताने की बजाय कर दिया पत्रकारवार्ता का आयोजन, जिसमें जमकर वर्तमान विधायक की आलोचना करते हुए भड़ास निकाली गई, साथ ही पार्टी को भी चेतावनी दे दी कि टिकट बदलो नहीं तो अंजाम भुगतने तैयार रहो. अब देखने वाली बात यह है कि पार्टी बैकफुट पर जाती है या फिर आक्रोशित अपने नेता-कार्यकर्ताओं को पटाने-फुसलाने में सफल हो पाती है, लेकिन इतना जरूर है कि ये विद्रोही नेता विधायक जी से तो पटने से रहे.

साले जी तो हो गये दलबदलू, साली जी का क्या...

- प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह जी के साले कांग्रेस में क्या गये, जबलपुर शहर में भी लोग तरह-तरह की  बातेें करने लगे. सीएम साहब की एक साली साहिबा भी यहीं पर राजनीति करती हैं, वे नगर निगम में एमआईसी मेंबर भी हैं, उनकी निष्ठा भाजपा में बरकरार है, लेकिन जब इनके भाई साहब ने दल बदल लिया तो बहन जी और सीएम साहब की साली साहिबा पर भी इनसे जलने वाले लोग नजरें गड़ाए हुए हैं कि कहीं यह भी तो नहीं भविष्य में कांग्रेस में शामिल हो जायेंगी. अब बात तो फिलहाल पूरी तरह से हवा-हवाई ही है, लेकिन राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता, जब जिसको मौका मिलता है चौका जडऩे से नहीं चूकता.

ऐसा मौका कलेक्टरी करने में कम ही आता है

- यह तो सर्वविदित है कि राष्ट्रीय पर्व हो या अन्य कोई प्रमुख आयोजन, उसमें मुख्य अतिथि नेता यानी मंत्री जी या फिर जनप्रतिनिधि ही होते हैं, ऐसा अवसर कलेक्टरी के कार्यकाल में बिरला ही आता है, जब कलेक्टर को किसी समारोह में शिरकत करने का मौका मिलता हो, यह मौका मध्य प्रदेश के सभी कलेक्टरों को आखिरकार पिछले दिनों मिल ही गया, यह इसलिए कि इन दिनों विधानसभा चुनाव के चलते आचार संहिता लगी हुई है, नेताजी को कोई चांस नहीं है कि वे आयोजन में शामिल हों, इसलिए कलेक्टरों को मध्य प्रदेश की स्थापना दिवस के अवसर पर परेड की सलामी लेने का गोल्डन चांस मिल गया. जिसे देख कर लोग यही कह रहे हैं कि यह क्षण इन कलेक्टरों को आजीवन याद रहेगा, वह भी चुनावी मौसम के चलते.

टिकट मिली तो ऐसा लगा मानो चुनाव जीत लिए..

-भाजपा ने 2 नवम्बर को अपने प्रत्याशियों की घोषणा की, इस लिस्ट में जिन लोगों के नाम थे, उन्होंने अपने समर्थकों के साथ ऐसा जश्न मनाया, लड्डू बांटे, फूल-माला पहने मानो, टिकट नहीं मिली है, बल्कि वे चुनाव ही जीत लिए हैं. अब इन नेताओं को निकट से जानने वाले तो यही कह रहे हैं कि भैया सत्ता पक्ष की ओर से जिसे टिकट मिल जाए, वह तो खुशनसीब वाला ही होगा, साथ ही जब जबलपुर की सीट से टिकट मिले तो प्रत्याशी खुद थोड़े ही चुनाव लड़ेगा, यह चुनाव तो प्रदेश अध्यक्ष की प्रतिष्ठा का प्रश्न है, इसलिए प्रदेश संगठन जबलपुर पर पूरा ध्यान देगा, यही कारण है कि भैया लोग अभी से ही जश्न मना रहे हैं. अब इन भैयों को कौन समझाए कि लोकतंत्र में जनता-जनार्दन ही सर्वोपरि है, लेकिन शायद नेता यह भूलते जा रहे हैं.

रिपोर्ट प्रदीप मिश्रा, अजय श्रीवास्तव.
 

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