खबरंदाजी. यह निर्विवाद सत्य है कि भारत को आजादी दिलाने में अनेक नेताओं का योगदान रहा, लेकिन इस आजादी को स्थाई आधार प्रदान करने में एकमात्र सरदार पटेल का सबसे बड़ा योगदान था! 

भारत के लोकप्रिय पुरुष जवाहरलाल नेहरू और लौह पुरुष सरदार पटेल को लेकर कुछ समय से यह स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है कि वे एक-दूजे के विरोधी थे?

प्रेस रिपोर्ट्स पर भरोसा करें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी संसद के अपने संबोधन में कहा था कि अगर पटेल प्रधानमंत्री होते तो कश्मीर जैसी समस्या हल हो गई होती!

ऐसे तो भाजपा के लोकप्रिय पुरुष नरेन्द्र मोदी और लौह पुरुष लालकृष्ण आडवानी के बारे में भी कहा जा सकता है कि यदि वे प्रधानमंत्री होते तो राम मंदिर बन गया होता?

राजनीतिक विचारों के नजरिए से भले ही पीएम नरेन्द्र मोदी, नेहरू से अलग हों, लेकिन सियासी अंदाज में वे नेहरू के राजनीतिक अंदाज के ज्यादा करीब हैं!

नेहरू चाचा भी हर हाल में नेतृत्व चाहते थे और नरेन्द्र काका भी हर हाल में नेतृत्व बनाए रखना चाहते हैं?

कहने को पटेल की मूर्ति दुनिया की सबसे उंची मूर्ति है, लेकिन आम भारतीयों के दिलों में सरदार पटेल का जो कद है वह इस मूर्ति से कई ज्यादा बड़ा है? इसलिए सरदार पटेल को जितना भी सम्मान दिया जाए कम है, लेकिन इसकी आड़ में भारत के इतिहास को प्रदूषित करने की कोशिश घातक है!

बीबीसी में वरिष्ठ पत्रकार पंकज श्रीवास्तव की रिपोर्ट पर विश्वास करें तो... पिछले कुछ सालों में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर हमले के लिए जिस तरह तत्कालीनी उपप्रधानमंत्री सरदार पटेल का इस्तेमाल किया जा रहा है, वह अभूतपूर्व है.

व्हाट्सऐप संदेशों यह बात तेजी से फैलाई गई है कि सरदार पटेल और नेहरू एक दूसरे के विरोधी थे. पटेल ज्यादा काबिल थे और प्रधानमंत्री उन्हें ही बनना चाहिए था. 

यह रिपोर्ट बताती है कि... भारत की आजादी का दिन करीब आ रहा था. मंत्रिमंडल के स्वरूप पर चर्चा हो रही थी. 1 अगस्त 1947 को नेहरू ने पटेल को लिखा- कुछ हद तक औपचारिकताएं निभाना जरूरी होने से मैं आपको मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए लिख रहा हूँ. इस पत्र का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि आप तो मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तंभ हैं.

पटेल ने 3 अगस्त 1947 को नेहरू के पत्र के जवाब में लिखा- आपके 1 अगस्त 1947 के पत्र के लिए अनेक धन्यवाद. एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग और प्रेम रहा है तथा लगभग 30 वर्ष की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता. आशा है कि मेरी सेवाएं बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी. आपको उस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी शुद्ध और संपूर्ण वफादारी और निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी पुरुष ने नहीं किया है.

हमारा सम्मिलन और संयोजन अटूट और अखंड है और उसी में हमारी शक्ति निहित है. आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूं.

यही नहीं, 2 अक्टूबर, 1950 को इंदौर में एक महिला केंद्र का उद्घाटन करने गये पटेल ने अपने भाषण में कहा- अब चूंकि महात्मा हमारे बीच नहीं हैं, नेहरू ही हमारे नेता हैं. बापू ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था और इसकी घोषणा भी की थी. अब यह बापू के सिपाहियों का कर्तव्य है कि वे उनके निर्देश का पालन करें और मैं एक गैर-वफादार सिपाही नहीं हूं.

गुजरात के लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे पीएम नरेन्द्र मोदी को शायद नवजीवन पब्लिशिंग हाउस, अहमदाबाद से प्रकाशित- सरदार पटेल का पत्र व्यवहार पढ़ने का समय नही मिल पाया होगा, वरना वे नेहरू-पटेल को लेकर कोई टिप्पणी नहीं करते!

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