पलपल संवाददाता, जबलपुर. शहर की एक विधानसभा क्षेत्र में भाजपा से अपनी टिकट फाइनल समझकर बैठे भाई साहब की केंट क्षेत्र की मैडम ने नींद उड़ाकर रख दी है. मैडम शुरुआती दौर में तो चुप्पी साधे हुए बैठी रही लेकिन ऐन वक्त पर पूर्व क्षेत्र से दावेदारी पेश कर दी. मैडम की दावेदारी के बाद स्थानीय स्तर पर तो खलबली मची, पार्टी में उच्च स्तर पर भी हड़कम्प मच गया, जिस टिकट को लेकर निश्चिंतता का माहौल रहा, अब वहां पर ऐसा पेंच फंसा है, जिसे निकालना बड़ा मुश्किल हो गया है, खैर जो भी मैडम द्वारा फंसाए गए पेंच में किसका लाभ होता है किसका नुकसान यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन यह बात तो तय है कि एकाधिकार का सिंहासन तो डोल ही गया है.

यहां तो खेल बिगाडऩे की तैयारी है-

टिकट को लेकर हमेशा घमासान कांग्रेस में होता था, लेकिन इस बात घमासान भाजपा में भी कम नही है, यहां तक कि शहर की एक विधानसभा में दो बार विधायक रह चुके भईया की टिकट इस बार कटने के आसार सबसे ज्यादा प्रबल है. भईया भी इस बात को अच्छी तरह से जानते है, जिसके चलते भईया भी कुछ भी कहते नजर आ रहे है, यहां तक कि उन्होने अपने छर्रो से कह दिया है कि यार तैयार रहना पार्टी टिकट नही देगी तो अपना इनका खेल भी बिगाड़ देगे, अब भईया खेल बिगाड़ेगें तो नुकसान तो भाजपा को ही झेलना पड़ेगा, अब देखना यह है कि भईया को टिकट मिलता है या नहीं, पार्टी के आला नेता किस तरह से भईया को शांत कर पाएगें, क्योंकि भईया भी अड़ी करने में किसी से कम नहीं है, अपनी पर आ गए तो कुछ नही दिखेगा.

पापा अब तो मान जाओ..

जबलपुर की राजनीति में लम्बे समय से दखल रखने वाले परिवार के एक सदस्य को टिकट के लिए जितनी जद्दोजहद करना पड़ रही है, शायद इससे पहले कभी ऐसा देखने को नहीं मिला है. इस परिवार का राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा दखल रहा है कि टिकट की इच्छा जाहिर करने पर टिकट फाइनल हो जाती थी, लेकिन इस बात इन बाबू साहब को टिकट के लिए काफी परेशान होना पड़ रहा है, कारण यही है कि पापा जी का अचानक मूड शायद बदल गया है, जिसके चलते छोटे बाबू साहब को दिक्कत हो रही है. खैर जो भी छोटे बाबू साहब की भावनाओं का ध्यान रखते हुए पापा को हरी झंडी देना ही पड़ेगी, इसके लिए छोटे बाबू साहब भी यही कह रहे है कि पापा अब तो मान जाओ. पिछली बार तो हमने आपकी बात मान ली थी.

काटे नहीं कट रहे दिन और रात-

टिकटों के फाइनल होने का क्रम लगभग अंतिम दौर में है, इस दौर में दावेदारों के लिए एक एक दिन एक-एक साल के समान लग रहा है. दिन में चैन नहीं है तो रात को नींद नहीं आ रही है, बिस्तर पर करवट बदलते हुए कब रात बीत जाती है पता नहीं चलता है, दिन में इधर-उधर फोन करके अपने अपने रहनुमाओं से बात करके यही पता किया जा रहा है कि यार अब तो कुछ बता दो, अब तो हरी झंडी दे दो, ताकि दिल की धड़कन कुछ कम हो जाए. यह हाल दोनों की राजनैतिक दल के दावेदारों का है, खैर होगा वहीं जो भाई साहब लोग चाहेगें. लेकिन यहां तो दावेदारो के दिन और रात काटे नहीं कट रहे है.

अजय श्रीवास्तव, प्रदीप मिश्रा

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