नजरिया. वंशवाद और व्यक्तिवाद में कोई खास फर्क नहीं है, क्योंकि दोनों ही पक्षपात पर निर्भर है , फिर व्यक्तिवाद को स्वीकार करने वाली पीएम मोदी टीम वंशवाद से इतनी परेशान क्यों है? यदि कांग्रेस के पास राहुल गांधी का विकल्प नहीं है तो भाजपा के पास कौनसा नरेन्द्र मोदी का विकल्प है? रही बात नैतिकता की तो यदि वशंवाद राजनीतिक रूप से अनैतिक है तो जनता द्वारा चुनाव में नकारे गए उम्मीदवारों को मंत्री बनाना कौनसी प्रजातांत्रिक नैतिकता है?

दरअसल, राजनीति में नेता का आकर्षण ही काम करता है, यह आकर्षण गांधी परिवार में है तो यही जादू पीएम मोदी का भी रहा है, यही वजह है कि न तो कांग्रेस वंशवाद से मुक्त हो पा रही है और न ही भाजपा व्यक्तिवाद से छुटकारा पा सकती है!

खबर है कि... भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेता और पीएम मोदी सरकार में केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का कहना है कि

भाजपा एक परिवार की पार्टी नहीं है! यह वह पार्टी नहीं है जो जाति, धर्म और भाषा के आधार पर राजनीतिक करती है? 

उनका कहना है कि... पहले प्रधानमंत्री ने प्रधानमंत्री को जन्म दिया, मुख्यमंत्री ने मुख्यमंत्री को जन्म दिया और ऐसे ही चलता रहता तो लोकतंत्र खत्म होने के कगार पर था, मगर हमने इसे बदल दिया! 

तो क्या मान लिया जाए कि भाजपा पूरी तरह से वंशवाद के खिलाफ है और भविष्य में किसी भाजपा नेता के वंशजों को टिकट नहीं देगी? सच्चाई तो यही है कि वंशवाद का सैद्धान्तिक विरोध करना जितना आसान है, उसे प्रायोगिक तौर पर अपनाना उतना ही मुश्किल है!

वैसे बड़ा सवाल यह है कि वंशवाद में बुराई क्या है? फैसला तो जनता को करना है! क्या जनता पर भरोसा नहीं है?

ग्लैमर वल्र्ड में भी वंशवाद का बोलबाला रहा है, तो नतीजा क्या है? कितने सुपर स्टार के बेटे सुपर स्टार बन गए? दर्शकों ने दूध-का-दूध और पानी-का-पानी कर दिया!

आरक्षण भी एक तरह का वंशवाद ही है? यदि किसी ने सामान्य वर्ग में जन्म लिया तो उसे आरक्षण नहीं मिलेगा? तो क्या पीएम मोदी टीम आरक्षण को भी खत्म कर देगी?

जाहिर है, वशंवाद महज कांग्रेस का विरोध करने का एक राजनीतिक हथियार है? वंशवाद यदि गलत है तो व्यक्तिवाद भी गलत ही है! कांग्रेस और भाजपा तो क्या, कोई भी राजनीतिक दल इनसे मुक्त नहीं हो सकता है?

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