इनदिनों. वैसे तो प्रादेशिक चुनाव में मध्य प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी टक्कर है, लेकिन नए राजनीतिक दल- सपाक्स के उदय ने इन चुनावों को दिलचस्प बना दिया है! प्रादेशिक चुनाव में सपाक्स की मौजूदगी बेअसर रहेगी या असरदार, इस पर कोई भी आश्वस्त नहीं है? न जनता और न ही सियासी दल! इस साल गांधी जयंती के अवसर पर सपाक्स ने नई पार्टी के गठन का एलान किया और नई पार्टी का नाम- सपाक्स समाज पार्टी रखा गया. इस मौके पर बताया गया कि पार्टी प्रदेश की सभी 230 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी, हीरालाल त्रिवेदी पार्टी के पहले अध्यक्ष बने, साथ ही चार उपाध्यक्ष भी बनाए गए. यही नहीं, पार्टी ने अपना झंडा भी लांच किया.

याद रहे, इससे पहले भोपाल में सपाक्स की महाक्रांति रैली हुई थी जिसमें ऐलान किया गया था कि 2 अक्टूबर 2018 को पार्टी का गठन किया जाएगा. खबरों की माने तो सपाक्स संगठन से राजनीतिक दल बनने के बाद भाजपा नेता राजीव खंडेलवाल, सपाक्स से जुड़ गए हंै, उन्हें उपाध्यक्ष बनाया गया है, वहीं मप्र भूमि सुधार आयोग की सदस्य डॉ. वीणा घाणेकर, आईएएस ने सपाक्स में जाने के लिए आयोग से इस्तीफा दे दिया है! एससी-एसटी एक्ट संशोधन का विरोध सपाक्स का मुख्य मुद्दा है? चुनाव के दौरान प्रमोशन में आरक्षण का विरोध भी इनका प्रमुख चुनावी मुद्दा होगा. सपाक्स मध्य प्रदेश की सभी 230 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी!

यह भी गौरतलब है कि 30 सितंबर 2018 को महाक्रांति रैली के बाद सपाक्स ने सरकार पर आरोप लगाया था कि उसने रैली को असफल करने के लिए हर तरीके के हथकंडे अपनाए थे, करीब अठारह ट्रेन रद्द करने के साथ-साथ भोपाल शहर में सभा की अनुमति नहीं दी गई थी, इसके बावजूद समाज के लोग रैली में शामिल होने भोपाल आए! उधर, करणी सेना समेत कुछ और संगठन भी इस मुद्दे पर सपाक्स के साथ इत्तेफाक रखते हैं और सपाक्स भी अपना पूरा दम दिखा रही है, परन्तु परिणाम को लेकर सभी पसोपेश में हैं? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि एमपी के चुनाव में सपाक्स सफल हो गई तो देश की सियासी तस्वीर बदल जाएगी? यह दिल्ली में आप जैसा असर होगा! सपाक्स के अध्यक्ष हीरालाल त्रिवेदी का कहना है कि- देश में जाति और धर्म की समानता के आधार पर सभी सीटों पर विधानसभा और लोकसभा का चुनाव लडेंगे. उनका कहना है कि- हमारी पार्टी स्वतंत्र है. किसी भी दल को समर्थन नहीं करेंगे.

हमारा अपना चुनावी एजेंडा है और उस पर ही चलेंगे! हीरालाल त्रिवेदी का यह भी कहना था कि केंद्र सरकार निजी क्षेत्र में भी आरक्षण लागू करना चाहती थी? इसके लिए वह बिल भी लाने वाली थी, लेकिन समाज की एकजुटता और विरोध को देख नहीं लाई! उधर, देशभर के विभिन्न सियासी और सामाजिक संगठनों की नजरें भी सपाक्स पर हैं और एमपी से बाहर जन चेतना मंच जैसे संगठन भी उसका समर्थन कर रहे हैं, इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि सपाक्स क्या कमाल दिखा पाती है? यदि सपाक्स कामयाब रही तो देश की राजनीति को एक नई दिशा मिलेगी और यदि नाकामयाब रही तो सियासी दलों की वोट बैंक आधारित राजनीति जारी रहेगी!

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