इनदिनों. सपाक्स पार्टी जिन मुद्दों को लेकर सियासत के संसार में उतरी है, उसके समर्थक तो अच्छे खासे हैं, लेकिन क्या ये समर्थक सपाक्स को सीटें दिला पाएंगे? यह बेहद महत्वपूर्ण सवाल है! 

क्योंकि अभी सपाक्स का सियासी असर खुलकर सामने नहीं आया है, इसलिए हार-जीत का कोई भी अनुमान जल्दबाजी होगा? हो सकता है चुनाव नतीजों में सपाक्स कोई राजनीतिक धमाका कर दे? और यह भी हो सकता है सपाक्स समर्थन को सीटों में बदल ही नहीं पाए! क्योंकि सपाक्स के दिल से समर्थक तो सभी राजनीतिक दलों में हैं, लेकिन अनुशासन की सीमा रेखा कितने पार कर पाते हैं? यह बड़ा प्रश्न है! 

अभी तक मध्य प्रदेश में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही नजर आ है, यह बात अलग है कि जहां भाजपा-कांग्रेस में बीच कांटे की टक्कर है वहां सपाक्स, बसपा, आप आदि पार्टियों की मौजूदगी बड़ा बदलाव ला सकती है?

खबर है कि सपाक्स... सामान्य, पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण समाज पार्टी के प्रमुख हीरालाल त्रिवेदी ने इंदौर में प्रेस से कहा कि- हम पर भाजपा और कांग्रेस, दोनों तरफ से आरोप लग रहे हैं. ये दोनों पार्टियां हमें एक-दूसरे की बी टीम बता रही हैं, लेकिन हम इस प्रदेश की ए टीम हैं! हम भाजपा और कांग्रेस को बी तथा सी दर्जे की टीमें मानते हैं? 

भाजपा या कांग्रेस से गठबंधन के सवाल पर हीरालाल त्रिवेदी का कहना था कि- हम अपने मुद्दों को लेकर काम कर रहे हैं! फिलहाल हमारे सामने किसी दल की सरकार बनाने या बिगाड़ने का सवाल नहीं है? जो दल हमारे मुद्दों और हमारी विचारधारा के समर्थन के लिये आगे आयेगा, हम उसका साथ देंगे!

एक सवाल के जवाब में हीरालाल त्रिवेदी का कहना था कि- मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि हम अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के हितों के विरोधी नहीं हैं, हम चाहते हैं कि शिक्षा संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आर्थिक आधार पर समाज के सभी तबकों को आरक्षण दिया जाये!

याद रहे, चुनाव चिन्ह आवंटित किये जाने को लेकर सपाक्स पार्टी का आवेदन इस वक्त निर्वाचन आयोग के सामने लम्बित है, लेकिन पार्टी एमपीे की सभी 230 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रही है, यही नहीं त्रिवेदी का कहना था कि सपाक्स पार्टी 2 नवंबर 2018 तक अपने समर्थित उम्मीदवारों की औपचारिक घोषणा कर देगी? 

सपाक्स के सक्रिय होने के बाद राजनीतिक जानकार इस गणित में उलझे हैं कि चुनाव में सपाक्स की मौजूदगी से भाजपा और कांग्रेस को कितना नुकसान होगा? यह गणित तो चुनावी नतीजों के बाद ही स्पष्ट होगी, परन्तु इस बीच सभी राजनीतिक दलों में प्रभावी ब्राह्मण नेताओं का महत्व जरूर बढ़ गया है?

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