इन दिनों. राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार ने पांच वर्षों में वागड़ की ओर ध्यान ही नहीं दिया, परिणाम? प्रादेशिक सरकार की इस उपेक्षा-उदासीनता का खामियाजा भाजपा विधायकों को भुगतना होगा! और यदि, वागड़ के बड़े कांग्रेसी नेता- महेन्द्रजीत सिंह मालवीया, ताराचन्द भगोरा और अर्जुन बामनिया एकजुट होकर कांग्रेस के लिए खड़े हो गए तो वागड़ क्षेत्र की एक सीट भी हांसिल करना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती होगी! राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पिछले चुनावों के सापेक्ष केवल पांच से दस हजार वोटों की बदली वागड़ की सियासी तस्वीर बदल सकती है? पिछले विधानसभा के मुकाबले इस बार की चुनावी तस्वीर कुछ और है. गुजरात से वागड़ का पुराना रिश्ता है, लिहाजा पिछले चुनाव में मोदी मैजिक का जोरदार असर था, जो इस बार लगभग समाप्त है!

राजनीतिक बदलाव के दौर में पिछली बार इस क्षेत्र में भाजपा ने नौ में से आठ विधानसभा सीटों पर कामयाबी दर्ज करवाई थी. ऐसे समय में भी महेन्द्रजीत सिंह मालवीया ने 81,016 वोट प्राप्त करके 14,325 वोट से बागीदौरा सीट जीत ली थी, जबकि डंूगरपुर, सागवाड़ा और कुशलगढ़ की सीटें मामुली वोटों के अंतर से भाजपा ने जीती थी. बांसवाड़ा कांग्रेस का गढ़ रहा है तथा राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी लगातार इस सीट से ताउम्र जीतते रहे. उनके निधन के बाद यहां से भाजपा के भवानी जोशी जीते, लेकिन उसके बाद यहां एक बार कांग्रेस तो एक बार भाजपा जीतती रही! वर्ष 1998 में कांग्रेस के रमेश पंड्या जीते, 2003 में फिर भाजपा के भवानी जोशी जीते, 2008 में अर्जुन बामनिया जीते तो 2013 में भाजपा के धनसिंह जीते, यदि यही क्र्रम बना रहा तो इस बार फिर अर्जुन बामनिया के लिए बेहतर संभावनाएं हैं!

जहां डंूगरपुर नगर परिषद ने शहर की तस्वीर बदल कर भाजपा के लिए अच्छी स्थिति बनाई है उसके उलट बांसवाड़ा नगर परिषद के कार्यों ने भाजपा के सामने प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है, जिसका लाभ कांग्रेस को मिलेगा? इन पांच वर्षों में राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार ने भी इस क्षेत्र के विकास पर कोई खास ध्यान नहीं दिया. जहां वागड़ की तस्वीर बदलने वाली माही परियोजना के प्रति प्रादेशिक सरकार उदासीन रही वहीं वागड़ की रेल... रतलाम-बांसवाड़ा-डंूगरपुर-अहमदाबाद ठंडे बस्ते में डाल दी गई! जाहिर है, वागड़ के मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए भाजपा के पास कुछ भी नहीं है? मतलब... यदि वागड़ में भाजपा हारती है तो इसके लिए एमएलए कम और प्रादेशिक सरकार की उपेक्षा, उदासीनता ज्यादा जिम्मेदार होगी!

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