भारत में, सी-डैक (सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ़ एडवांस्ड कंप्यूटिंग) नाम सुपरकंप्यूटर का पर्यायवाची बन गया हैं, एक ऐसा शब्द जो किसी भी कंप्यूटिंग के माहौल को दर्शाता है जो उन्नत उपकरणों, तेज कम्प्यूटेशनल गति और दक्षता का उपयोग करता है ताकि विभिन्न क्षेत्रों जैसे वैज्ञानिक आर एंड डी, मौसम पूर्वानुमान, मिसाइल साईमुलेशन, अंतरिक्ष विज्ञान, दवा अनुसंधान आदि में वैज्ञानिकों की सहायता मिल सके.

वास्तव में एक सुपरकंप्यूटर “सुपर” क्या बनाता है समानांतर कंप्यूटिंग (मतलब की एक साथ बहुत सी गिनती/गणना करना) का कांसेप्ट (अवधारणा). दरअसल, इस पैरेलल प्रोसेस में हर एक काम को अलग-अलग छोटे कामों में बांटा जाता है और फिर सभी कामों को एक साथ समानांतर रूप से किया जाता है. फिर हर एक प्रोसेसर से मिले परिणामों को जोड़कर अंतिम परिणाम पता कर लिया जाता है.

1980 के दशक के अंत में भारत में सुपरकंप्यूटर बनाने का प्रयास शुरू हुआ, जब अमेरिका ने लगातार प्रौद्योगिकी प्रतिबंधों के कारण क्रे सुपरकंप्यूटर के निर्यात को रोक दिया. 80 के दशक के दौरान, संयुक्त राज्य अमेरिका और कुछ अन्य यूरोपीय देशों ने सुपर कंप्यूटर विकसित किए थे, जो उपग्रहों और परमाणु हथियारों के विकास के लिए महत्वपूर्ण थे. इन देशों ने भारत से सुपर कंप्यूटर बनाने के तरीके व ज्ञान को साँझा करने से इनकार कर दिया, क्योंकि उन्हें लगा कि एक विकासशील देश मौसम के हालचाल के बजाय मिसाइलों और युद्धपोतों को डिजाइन करने के लिए इसका प्रयोग कर सकता है.

इसके बाद भारत ने मार्च 1988 में एडवांस्ड कंप्यूटिंग (सी-डैक) के विकास केंद्र की स्थापना की ताकि उच्च गति की कम्प्यूटेशनल जरूरतों को पूरा किया जा सके व अन्य परेशानियाँ, जहाँ भी बहुत अधिक गणना करनी पडती है, उन्हें हल करने के लिए स्वदेशी सुपरकंप्यूटर का विकास किया जा सके.

एसएसी-पीएम (साइंटिफिक एडवाइजरी काउंसिल टू द प्राइम मिनिस्टर) की एक विशिष्ट सिफारिश के बाद, सी-डैक को संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत तत्कालीन इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग (अब सूचना प्रौद्योगिकी विभाग (डीआईटी) मंत्रालय की साइंटिफिक सोसाइटी के रूप में स्थापित किया गया था.

इस प्रोजेक्ट का नेतृत्व करने के लिए, पीएम राजीव गांधी ने एक ऐसे व्यक्ति को चुना जिन्होंने अपने पूरे जीवन को ‘सुपर’ नहीं देखा था और उन्हें उससे भी दोगुने कम समय में इसे बनाना था. लेकिन विजय पांडुरंग भाटकर शॉर्टकट के बारे में सभी जानते थे- देश के इस महान नंबर-क्रंचर ने सीधे चौथी कक्षा से स्कूल शुरू किया था और फिर भी हमेशा टॉप किया. जब राजीव गांधी भाटकर से मिले, तो उन्होंने उनसे तीन प्रश्न पूछे,

क्या हम ये कर सकते हैं?”

भाटकर ने जबाब दिया, “मैंने कभी भी सुपरकंप्यूटर नहीं देखा क्योंकि हमारे पास कोई सुपरकंप्यूटर नहीं है. मैंने सिर्फ क्रे की तस्वीर देखी है. पर, हाँ, हम यह कर सकते हैं.”

इसमें कितना समय लगेगा?”

भाटकर ने तुरंत जबाब दिया, “जितना हम यूएस से एक क्रे आयत करने में समय लेंगे उससे कम.”

और इसमें कितना पैसा लगेगा?”

भाटकर ने कहा, “संस्थान बनाने, तकनीक विकसित करने, भारत के पहले सुपरकंप्यूटर को बनाने और चालू करने तक के पूरे प्रयास में क्रे की लागत से कम लागत आएगी.”

उनके जबाब से खुश होकर प्रधानमन्त्री ने इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी. पुणे में स्थित सी-डैक में देश भर से वैज्ञानिकों को भारत के सबसे बड़े तकनीकी प्रोजेक्ट में से एक, इस प्रोजेक्ट में शामिल होने के लिए बुलाया गया.

और अगले तीन सालों में, यह असाधारण काम हो गया. सभी वैज्ञानिकों के शामिल होने के साथ, सी-डैक ने आखिरकार प्रस्तावित समय सीमा के भीतर अपना काम पूरा कर लिया. साल 1991 में सी-डैक ने भारत के पहले स्वदेशी सुपरकंप्यूटर को शुरू किया- परम 8000!

पहली बार, एक विकासशील देश ने एडवांस्ड कंप्यूटर के विकास में इस तरह की उपलब्धि को हासिल किया था. कहने की जरूरत नहीं है कि इस उपलब्धि पर दुनिया चौंक गई थी. कई लोग वास्तव में इसके एक सुपरकंप्यूटर होने के बारे में भी संदिग्ध थे. यही वह वक्त था जब भाटकर ने परम प्रोटोटाइप को एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन और सुपरकंप्यूटर की प्रदर्शनी में दिखाने का फैसला किया. यहां, इसे प्रदर्शित किया गया, बेंचमार्क किया गया और औपचारिक रूप से एक सुपरकंप्यूटर घोषित किया गया. उस समय अमेरिकी समाचार पत्रों ने एक शीर्षक के साथ समाचार प्रकाशित किया, “सुपरकंप्यूटर न मिलने पर, गुस्साए भारत ने यह कर दिया!”

एक मल्टीप्रोसेसर मशीन, परम 8000 को 5 जीफ्लॉप्स पर बेंचमार्क किया गया था, और यह उस समय दुनिया का दूसरा सबसे तेज़ सुपरकंप्यूटर बन गया. साथ ही, यूएस मशीन क्रे की तुलना में इसकी कीमत बहुत ही कम थी. जिसके चलते अमेरिकी कंपनी जिसने क्रे का निर्माण किया था, उसे इसकी कीमत गिरानी पड़ी.

परम 8000 ने कई एडवांस्ड सुपरकंप्यूटर की एक पूरी श्रृंखला लांच करने का निर्णय किया था. साल 2002 में, परम 20000, या परम पद्मा ने 1 टीफ्लॉप की गति के साथ टेराफ्लॉप (हजार अरब फ्लॉप) के बैरियर को तोड़ दिया. इस श्रृंखला में नवीनतम मशीन परम इशान और परम कंचनजंगा हैं.

आईआईटी गुवाहाटी में स्थापित,परम इशान का उपयोग कम्प्यूटेशनल रसायन, कम्प्यूटेशनल तरल गतिशीलता, कम्प्यूटेशनल विद्युत चुम्बकीय, सिविल इंजीनियरिंग संरचनाओं, नैनो-ब्लॉक, क्लाइमेट मॉडलिंग और भूकंपीय डेटा प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है. एनआईटी सिक्किम के सुपरकंप्यूटिंग सेंटर में स्थित परम कंचनजंगा का इस्तेमाल संस्थान के साथ-साथ राज्य के शोधकर्ताओं और छात्रों द्वारा इंजीनियरिंग क्षेत्र में शोध के लिए किया जा रहा है. दिलचस्प बात यह है कि संस्कृत में ‘परम’ का मतलब सर्वोच्च होता है!

सुपरकंप्यूटर की परम श्रृंखला के आधार पर, भाटकर ने राष्ट्रीय परम सुपरकंप्यूटिंग सुविधा (एनपीएसएफ) भी बनाया है. इसे अब राष्ट्रीय ज्ञान नेटवर्क (एनकेएन) पर गरुड़ ग्रिड के माध्यम से ग्रिड कंप्यूटिंग सुविधा के रूप में उपलब्ध कराया गया है, जो देश भर में हाई परफॉरमेंस कंप्यूटिंग (एचपीसी) इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध करा रहा है. उन्होंने भारतीय भाषाओं में सुपरकंप्यूटिंग करने की पहल की और वे ऐसा करने में सफल रहे.

साल 2015 में, भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए भाटकर को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है.

इस रणनीतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में विजय भाटकर और सी-डैक के प्रयासों ने इस प्रकार भारत को दुनिया के चुनिंदा विकसित देशों के साथ दुनिया के सुपरकंप्यूटिंग मानचित्र पर रखा है. 2016 तक, देश और विदेशों में कई परम सिस्टम भेजे गए हैं. आज, संयुक्त राज्य अमेरिका और जापान के बाद केवल भारत, पेटास्केल सुपरकंप्यूटर डिजाइन कर रहा है.

सुपरकंप्यूटिंग के क्षेत्र में इस उम्दा प्रदर्शन के साथ यह स्पष्ट है कि भारत आगे और भी बेहतर करेगा.  भारत सरकार इस दिशा में काम कर रही है और इसीलिए 4,500 करोड़ रुपये राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन शुरू किया गया है. मिशन के तहत, भारत सरकार देश में 70 से अधिक उच्च प्रदर्शन कंप्यूटिंग सुविधाओं को स्थापित करने के लक्ष्य को प्राप्त करेगा.

हम उम्मीद करते हैं कि हमारा देश इसी तरह से तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़ता रहे.

मूल लेख: संचारी पाल

साभार: द बेटर इंडिया डॉट कॉम 

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