पिछले कुछ वर्षों से, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी (स्पेस टेक्नोलॉजी) के क्षेत्र में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की उपलब्धियां चारों तरफ सुर्ख़ियों में हैं, जिसकी वजह से देशवासियों को गर्व करने का मौका मिल रहा है और बहुत से छात्रों को तारों तक पहुंचने की प्रेरणा. हमारे सैटेलाइट्स की कामयाब लॉन्चिंग की घोषणा भारतीय संसद में तालियों की गड़गड़ाहट के साथ की जाती है. इसी कामयाबी के चलते स्पेस टेक्नोलॉजी की बहुत से एप्लीकेशन आज हमारी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में मददगार साबित हो रही है. लेकिन इन सभी कामयाबियों के बीच हम कहीं न कहीं उन लोगों को भूलते जा रहें हैं, जिनकी वजह से भारत आज इस मकाम पर है – इन्ही गुमनाम नायकों में से एक हैं प्रोफेसर सतीश धवन! बेशक भारतीय स्पेस प्रोग्राम के जन्म का श्रेय विक्रम साराभाई को जाता है, जिन्होंने यह सपना देखा और इसकी नींव रखी.

पर इस सपने को सींचने वाले वैज्ञानिक थें प्रोफेसर धवन, जिन्होंने इसरो की स्थापना करके उसे विश्व-स्तर पर ला खड़ा किया. 25 सितंबर, 1920 को श्रीनगर में पैदा हुए सतीश धवन ने पंजाब विश्वविद्यालय से अलग-अलग विषयों में स्नातक की डिग्री प्राप्त की- गणित विषय से बीए, अंग्रेजी साहित्य में एमए और मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीई. जब 1947 में भारत ने एक नए स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपना पहला कदम रखा, तब धवन अपनी आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका चले गए थे. उन्होंने अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिनेसोटा से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में एम.एस की डिग्री पूरी की.

इसके बाद वे एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल करने के लिए कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (कैल्टेक) गए. इसके बाद धवन ने कैल्टेक से ही साल 1954 में एरोनॉटिक्स और गणित में प्रमुख एयरोस्पेस वैज्ञानिक प्रोफेसर हंस डब्ल्यू लिपमैन के मार्गदर्शन में अपनी पीएचडी की पढ़ाई पूरी की. इसी दौरान उन्होंने फ्लूएड डायनामिक्स क्षेत्र में अपना रिसर्च करियर शुरू किया. इसके तुरंत बाद वे बंगलुरू के भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) में वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी के रूप में नियुक्त हुए. कुछ साल बाद, उन्हें एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख पद पर पदोन्नत किया गया.

उनके मार्गदर्शन में यह विभाग जल्द ही फ्लूएड डायनामिक्स के क्षेत्र में शोध का केंद्र बन गया. वास्तव में यह धवन द्वारा आयोजित किया गया पायलट प्रोजेक्ट ही था जिसने बंगलुरु की नेशनल एयरोस्पेस प्रयोगशालाओं में (NAL) में विश्व स्तरीय विंड टनल फसिलिटी (एयरक्राफ्ट, मिसाइलों और अंतरिक्ष वाहनों के एरोडायनेमिक परीक्षण के लिए) के निर्माण के लिए रास्ते खोले. अपने काम के प्रति उनकी जिम्मेदारी और समर्पण के लिए उन्हें साल1962 में आईआईएससी के निदेशक के तौर पर नियुक्त किया गया. इस प्रतिष्ठित पद पर नियुक्त होने वाले वे सबसे कम उम्र के वैज्ञानिक थे और साथ ही सबसे ज्यादा समय तक कार्यरत रहने वाले निदेशक भी.

आईआईएससी के निदेशक के रूप में 9 साल तक सेवा देने के बाद वे 1971 में एक साल के लिए आगे पढ़ने के लिए कैल्टेक चले गए. इस दौरान उन्हें भारतीय दूतावास से एक फोन आया. उन्हें बताया गया कि प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने अनुरोध किया है कि वे भारत लौट आए व इंडियन स्पेस प्रोग्राम का कार्यभार संभाल लें. यह फैसला 30 दिसंबर, 1971 को विक्रम साराभाई की अचानक हुई मृत्यु के बाद लिया गया था. भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के संस्थापक साराभाई, संचार विज्ञान, मौसम विज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में भारत के सामने आने वाली बाधाओं के समाधान खोजने के लिए अंतरिक्ष विज्ञान की शक्ति का उपयोग करना चाहते थे और इसी खोज को उन्होंने अपना जूनून बना लिया था.

धवन के साथ उनका सम्पर्क पहले ही हो चुका था, जब उन्होंने उनसे भारत में सॉलिड रॉकेट मोटर सुविधा स्थापित करने में तकनीकी सलाह मांगी थी. साराभाई की आकस्मिक मृत्यु के बाद, धवन ने देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम के मुख्य पदभार को संभालने का फैसला किया, लेकिन उनकी दो शर्ते थीं- अंतरिक्ष कार्यक्रम का मुख्यालय बंगलुरु में बनाया जाये और उन्हें इस पद के साथ-साथ आईआईएससी के निदेशक के पद का कार्यभार भी संभालने की अनुमति दी जाये (क्योंकि उनके लिए आईआईएससी उनका पहला और आखिरी प्यार था). उनकी इन दोनों शर्तों को मान लिया गया और कैल्टेक में अपना काम पूरा करके धवन भारत लौट आये.

मई 1972 में धवन ने भारत के अंतरिक्ष विभाग के सचिव के रूप में पदभार संभाला (तब तक अंतरिक्ष कार्यक्रम परमाणु ऊर्जा विभाग के अधीन आ गया था). तब से इन तीनों पदों को उन्होंने बहुत ही गरिमा के साथ संभाला- सभी विषयों पर काम, प्रोग्राम्स की फंडिंग और समय पर सभी टेक्नोलॉजी प्रोडक्ट का निर्माण, यह सभी कुछ उन्होंने सुनिश्चित किया. आने वाले दशक में, धवन ने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को असाधारण विकास और शानदार उपलब्धियों के साथ निर्देशित किया. इसरो में उन्होंने एक ऐसे गतिशील प्रबंधन संरचना की शुरुआत की, जो इनोवेशन को प्रोत्साहित करता था और फिर धीरे-धीरे पर उन्हें परिणाम मिलने शुरू हो गए.

इस सिस्टम में प्रोजेक्ट डायरेक्टर ने अलग-अलग केंद्रों से विशेषज्ञों की एक छोटी टीम की अध्यक्षता की. उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि पूरे इसरो समुदाय के स्वतंत्र प्रयासों को एक ही लक्ष्य की ओर संचालित किया जाए- चाहे वह सैटेलाइट हो या उसे लॉन्च करने वाला वाहन. संगठन के बाहर से विशेषज्ञों को शामिल करके पारदर्शिता और व्यवसायिकता को भी प्रोत्साहित किया गया था. धवन ने इसरो प्रोजेक्ट्स में स्वदेशी उद्योग की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया – आज, सैकड़ों औद्योगिक फर्म, (सार्वजनिक और निजी दोनों) इसरो के लिए स्पेस-क्वालिटी हार्डवेयर का बड़े पैमाने पर निर्माण करते हैं.

उन्होंने स्वयं इसरों में काम करने वाले युवा, बुद्धिमान और समर्पित कर्मचारियों को चुना, जैसे कि एपीजे अब्दुल कलाम को भारत के पहले लॉन्च वाहन एसएलवी – 3 विकसित करने वाले प्रोजेक्ट, रोद्दम नरसिम्हा को एनएलए में किए गए शोध कार्यों का नेतृत्व करने के लिए और यू.आर राव को उस टीम का नेतृत्व करने के लिए, जिसने देश का पहला सैटेलाइट आर्यभट्ट बनाया. इसके अलावा उन्होंने युवाओं को प्रोत्साहित किया! सफल होने पर इन युवा वैज्ञानिकों को उनके काम का श्रेय दिया जाता, तो कभी उनकी असफलताओं की ज़िम्मेदारी भी वे लेते. इस संदर्भ में, भारत के मिसाइल मैन और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने एक बार भारत के पहले लॉन्च वाहन, एसएलवी -3 के परियोजना निदेशक के रूप में अपने अनुभवों को दोहराया था.

एसएलवी -3 का पहला प्रयोगात्मक लॉन्च 10 अगस्त, 1979 को हुआ था, लेकिन यह अभियान सफल नहीं हो पाया. बाद में प्रेस कॉन्फ्रेंस में धवन ने कलाम से कहा कि वे सब कुछ संभाल लेंगे और उन्होंने वैसा ही किया. उन्होंने कहा,”दोस्तों, आज हमारा पहला सैटेलाइट लॉन्च था, लेकिन हम ऐसा करने में विफल रहे. हालांकि, कई प्रौद्योगिकियों में हम सफल हुए हैं और कुछ और में हमें अभी सफल होना है. इस सबसे ऊपर, मुझे यह एहसास है कि मेरे टीम के सदस्यों को सभी तकनीकी सहायता दी जानी चाहिए. मैं ऐसा ही करने वाला हूँ और हमारा अगला मिशन सफल होगा.” अगली बार 18 जुलाई, 1980 को एसएलवी – 3 लॉन्च किया गया और यह बहुत बड़ी सफलता थी. एसएलवी -3 ने 1980 में 40 किलोग्राम के रोहिणी उपग्रह को ऑरबिट में छोड़ा (जिससे भारत वास्तव में अंतरिक्ष युग में आया). इस बार धवन ने कलाम से अपनी टीम के सदस्यों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस संभालने को कहा.

धवन के कार्यकाल में इसरो ने भारत के विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिए अंतरिक्ष विज्ञान का उपयोग करने के विक्रम साराभाई के सपने को पूरा करने की दिशा में भी काम किया. उन्होंने ग्रामीण शिक्षा, रिमोट सेंसिंग और उपग्रह संचार में कई एक्सपेरिमेंट किये व कई प्रोग्राम भी चलाये. परिचालन संचार प्रणालियों (जैसे आईएनएसएटी) और रिमोट सेंसिंग सिस्टम (आईआरएस जैसे) का विकास इन महत्वपूर्ण प्रयासों के परिणाम हैं. रिटायर होने के बाद भी उन्होंने विज्ञान और प्रौद्योगिकी, विशेष रूप से अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में सार्वजनिक नीति के मामलों पर अपना ध्यान बनाये रखा.

दिलचस्प बात यह है कि वे अंतरिक्ष के सैन्यीकरण (मिलिट्री) के बारे में चिंतित थे और स्टार-वार्स पर बड़े पैमाने पर टिप्पणी किया करते थे. 3 जनवरी, 2002 को उनकी मृत्यु के साथ, भारत ने अपने सबसे प्रतिष्ठित और काबिल वैज्ञानिकों में से एक को खो दिया! धवन, भारत के वो लीजेंड थें, जिन्होंने उस हर एक संगठन की तस्वीर बदल दी जहां भी उन्होंने काम किया. एपीजे अब्दुल कलाम और रोद्दम नरसिम्हा (एनएएल के पूर्व निदेशक) ने अपनी पुस्तक “फ्लुएड मैकेनिक्स एंड स्पेस टेक्नोलॉजी में विकास” में लिखा था, “प्रोफेसर धवन अपने पेशेवर करियर में इंजीनियर, शिक्षक, शोध वैज्ञानिक, तकनीकी विशेषज्ञ, प्रबंधक, नेता और सलाहकार रहे हैं – वो भी अक्सर एक ही समय पर. उनके महान व्यक्तीत्व, सामाजिक मूल्यों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता और प्रबंधन में असाधारण निष्पक्षता ने छात्रों, सहयोगियों और प्रशासकों की कई पीढ़ियों को ऐसे प्रयास करने के लिए प्रेरित किया जो शायद वे कभी न करते.”

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