बात पुरानी है. थावरचंद गेहलोत तब केवल विधायक थे. विधानसभा में एक दिन वह छा गये. उनकी सीधी भिड़ंत अपने ही जैसे तीखे मिजाज वाले उप मुख्यमंत्री सुभाष यादव से हो गई. यादव ने गरजते हुए कहा, 'सहकारिता पंजीयक को हाथ लगाने वाले के दांत तोड़ दूंगा.'जवाब में गेहलोत भी पूरी दमदारी से बोले, 'मेरे पांव की धूल के बराबर भी नहीं हो तुम.'

उस समय यह सब बहुत अच्छा यूं लगा कि सहकारिता के भ्रष्टाचार को तब वाकई पंख लगे हुए थे. इसलिए जागरूक विरोधी विधायक की तरह गेहलोत का न दबते हुए अपनी बात कहना उन्हें हीरो बना गया. लेकिन शनिवार को नागदा में इन्हीं गेहलोत का, विधायक की हैसियत से काफी ऊपर उठने के बावजूद किया गया विधानसभा जैसा आचरण ही अखर रहा है. केन्द्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री गेहलोत इस बात पर कुपित हो गए कि एक महिला ने उनसे फरियाद करने की खातिर अपनी दुधमुंही बच्ची को मंच पर लिटा दिया. वह कह रही थी कि पति की मौत के चार महीने बाद भी उसे मुख्यमंत्री असंगठित मजदूर कामगार कल्याण योजना के तहत चैक नहीं मिल सका है. गेहलोत ऐसे भड़के कि पीड़िता द्वार बच्ची को वहां लिटाने को उन्होंने दादागिरी की संज्ञा दे डाली. साथ ही दानवीर कर्ण के कलयुगी अवतार की तरह दम्भ से भरकर उससे यह भी बोले, 'दे देंगे चैक.' 

तो यह उस  प्रदेश का हाल है, जहां के मुख्यमंत्री की ओर से रेडियो हर रोज चीखता है कि अब 'मजदूर हूं लेकिन मजबूर नहीं,' मैं नहीं रहूंगा तो भी शिवराज है ना परिवार की देखभाल के लिए. दो लाख रुपए मिलेंगे.' संबल योजना और इस विज्ञापन की हकीकत मोदी के सामाजिक न्याय मंत्री थावरचंद गेहलोत ने ही बयान कर दी. इस मजदूर का बकायदा योजना में पंजीकरण है, बावजूद उसकी मौत के चार महीने बाद भी उसे यह राशि नहीं मिली है तो इसका दोष किस पर आयद होता है. यह उस भाजपा का हाल है, जिसे उम्मीद है कि शिवराज की ऐसी लच्छेदार बातों और योजनाओं के दम पर वह लगातार चौथी बार यहां सरकार बनाने में कमयाब हो जाएगी. यह उस व्यक्ति का हाल है, जो संघ से प्रभावित कहा जाता है और जिसके पास वंचितों की मदद की गरज से बनाया गया सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय मौजूद है. जब ऐन चुनाव के समय भाजपाइयों की अकड़ का यह हाल है तो कल्पना कीजिए यदि लगातार चौथी फतेह भी इनके हिस्से आ गई तो फिर गुरूर में डूबे और कितने ऐसे या इससे भी शर्मनाक घटनाक्रम देखन कोे मिल सकते हैं. 

उस महिला की स्थिति सोचिए, जिसके पति की मौत हो चुकी है. उसकी चार संतानें हैं. बीमार ससुर की जिम्मेदारी भी उसके सिर पर है. लेकिन वह भटक रही है उस चैक के लिए जो उसका हक है और जो उसे अब से काफी समय पहले मिल जाना चाहिए था. शिवराज सरकार की कथनी और करनी में फर्क का यह एक साफ उदाहरण है. और भाजपा में एक मुकाम तक पहुंच चुके नेताओं के अख्खड़पन की भी यह जीती-जागती मिसाल है. बाकी और नहीं तो गेहलोत उससे कम से कम सम्माजनक तरीके से पेश आते. आश्वासन देकर विदा करते. जिस अखबार ने यह घटनाक्रम प्रकाशित किया है, उसमें यह जिक्र कहीं नहीं है कि गेहलोत ने वहां मौजूद अफसरों से महिला के मामले को दिखवाने के लिए कहा हो. तो फिर आप किस नस्ल के जन प्रतिनिधि हैं? 

सवाल तो संवेदनशील शिवराज सिंह चौहान से है जो उस घड़ी अगर वहां मौजूद होते तो शायद बच्ची को गोद में लेने से नहीं हिचकते, लेकिन यह सारी संवदेनशीलता आखिर उनके हिस्से में ही क्यों रह गई? पार्टी की संवेदनशीलता के तो ताजा उदाहरण सामने हैं. एक, थावरचंद गेहलोत और दूसरे नंदकुमार सिंह चौहान. क्या ऐसी सरकारी मशीनरी और पार्टीजनों के इस तरह के आचरण के बाद विधानसभा चुनाव में पार्टी का बेड़ा पार होने की बजाय बेड़ा गर्क होने की नौबत नहीं आ जाएगी? शिवराज की यह एक बड़ी असफलता है कि वे अपनी संवेदनशीलता को पार्टी और अपनी सरकार को अमल में लाने पर मजबूर नहीं कर सके.

एक लतीफा याद आता है. आदमी मरने के बाद यमलोक पहुंचा. किसी विशेष स्कीम के तहत उसे सहूलियत दी गई कि वह खुद तय कर ले कि स्वर्ग में जाना है या नर्क में. आदमी ने पहले नर्क की बुकलैट देखी. वह दंग रह गया. उसमें अप्सराएं थीं. रहवासियों को तमाम सुविधाएं दी गई थीं. वह ऐश का जीवन जी रहे थे. बगैर सोचे आदमी ने कहा कि वह नर्क जाना चाहता है. लेकिन वहां पहुंचते ही उसके पांव तले जमीन खिसक गई. क्योंकि वह वास्तव में भयावह नर्क था. अप्सराओं की जगह वहां पिशाचिनीं मिलीं. सुविधाओं की बजाय हरसंभव असुविधा का वहां बंदोबस्त था. आदमी ने शिकायत की तो उसे बताया गया कि दरअसल वह बुकलेट नर्क लोक के जनसंपर्क विभाग ने तैयार की थी. कल के घटनाक्रम के बाद मध्यप्रदेश के रेडियो पर गूंजने वाले 'मजदूर हूं, मजबूर नहीं,' वाले विज्ञापन की पंक्तियां भी इस बुकलेट जैसी ही प्रतीत हो रही हैं. शिवराज के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए, भले ही गेहलोत के लिए उनका आचरण शर्म का विषय हो या नहीं. 

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