इनदिनों. राजस्थान की राजनीति में दक्षिण राजस्थान की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. यही नहीं, आजादी के बाद यह क्षेत्र लंबे समय तक कांग्रेस का गढ़ रहा, नतीजा? पहले पूर्व मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया और बाद में पूर्व मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी का राजस्थान की राजनीति में दबदबा कायम रहा!

भाजपा को सबसे बड़ी परेशानी इसी क्षेत्र में पैर जमाने में हुई, लेकिन हरिदेव जोशी के गुजर जाने के बाद इस क्षेत्र में धीरे-धीरे भाजपा की ताकत बढ़ती गई और पहली बार पिछले विधानसभा चुनाव में तकरीबन 28 सीटों में से 25 सीटों पर भाजपा ने कब्जा जमा लिया, कांग्रेस को महज दो सीटें मिली?

इनमें से एक सीट पर पूर्व मंत्री महेन्द्रजीत सिंह मालवीया ने जीत दर्ज करा कर अपनी लगातार जीत का रिकार्ड कायम रखा, उस कांग्रेस विरोधी लहर में भी मालवीया की जीत ने उनका सियासी कद बढ़ा दिया था तो अब उन्हें कांग्रेस चुनाव अभियान समिति का सह-अध्यक्ष बनाया गया है, मतलब... वे प्रादेशिक राजनीति में ताकतवर बन के उभरे हैं! महेंद्रजीत मालवीया को कैंपेन समिति का सह-अध्यक्ष और प्रदेश चुनाव समिति का सदस्य बनाया गया है तो उनके समर्थकों को भरोसा है कि वे इस बार यदि कांग्रेस सरकार बनी तो उप-मुख्यमंत्री होंगे?

दक्षिण राजस्थान की ज्यादातर सीटें पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा जीतने में कामयाब जरूर रही थी, लेकिन हार-जीत का अंतर बहुत कम था, लिहाजा इस बार भाजपा के लिए ये सीटें बचाना बेहद मुश्किल है!

जाहिर है, यदि राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनती है तो दक्षिण राजस्थान की बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका होगी? ऐसी स्थिति में कांग्रेस के इस परंपरागत गढ़ को फिर से मजबूत बनाने के लिए सशक्त नेता की आवश्यकता होगी!

ब्राह्मण और भील, दोनों शुरू से ही राजस्थान में कांग्रेस के प्रबल समर्थक रहे हैं, लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में इनका रूझान भाजपा की ओर हुआ था जिसके परिणाम में भाजपा ने चमत्कारी कामयाबी पाई थी, यही नहीं लोकसभा चुनाव में तो राजस्थान की 25 में से 25 सीटें भाजपा ने जीत ली थी, लेकिन सियासी कारणों से पीएम मोदी सरकार की राजस्थान के प्रति उदासीनता और फिल्म पद्मावती जैसे मामले में केन्द्र सरकार की चुप्पी के नतीजे में उपचुनावों में भाजपा को हार नसीब हुई? इस विधानसभा चुनाव में भी प्रादेशिक मुद्दों से ज्यादा पीएम मोदी सरकार के नोटबंदी, जीएसटी, पेट्रोल-गैस के दाम जैसे निर्णयों ने प्रदेश सरकार के रोजगार, खेती-किसानी, बिजली जैसी उपलब्धियों पर पानी फेर दिया है!

जाहिर है, इस बार के चुनाव में केन्द्र के कर्मों की कीमत प्रादेशिक सरकार को चुकानी होगी?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार भले ही कांग्रेस राजस्थान में सरकार बनाने में कामयाब हो जाए, लेकिन अपने परंपरागत ब्राह्मण और भील समाजों को फिर से मजबूती से जोड़ने के लिए महेन्द्रजीत सिंह मालवीया, भंवरलाल शर्मा जैसे अपने समाज और क्षेत्र के प्रभावी नेताओं को उप-मुख्यमंत्री बनाने की जरूरत पड़ेगी!

इस बार तो पीएम मोदी सरकार के कारण कांग्रेस को बेहतर मौका मिल गया है, लेकिन आगे भी ऐसी स्थिति रहेगी यह कहना मुश्किल है, क्योंकि दक्षिण राजस्थान में भाजपा को स्थापित करने में उसकी विचारधारा पर आधारित स्कूलों और वनवासियों के उत्थान के लिए सक्रिय विभिन्न संगठनों की खास भूमिका रही है और इस आधार को तोड़ना आसान नहीं है? यही नहीं, इस क्षेत्र में भाजपा के पास गुलाबचन्द कटारिया, नंदलाल मीणा जैसे असरदार नेता भी हैं, लिहाजा कांग्रेस संगठन को मजबूत करने के लिए कदम नहीं उठाए गए तो सत्ता विरोधी लहर कमजोर पड़ने के बाद भाजपा के फिर से अच्छे दिन आ जाएंगे!

याद रहे, इस वक्त राजस्थान में कांग्रेस को जो जन-समर्थन मिल रहा है वह कांग्रेस के लिए नहीं है, बल्कि भाजपा के प्रति जन-आक्रोश के कारण है, इसलिए यह भाजपा विरोधी माहौल जैसे ही शांत होगा, कांग्रेस के लिए फिर-से सियासी समस्याएं खड़ी हो जाएंगी, इसलिए यदि कांग्रेस प्रादेशिक सत्ता में आती है तो सबसे पहले उसे संगठन पर ध्यान देने की जरूरत पड़ेगी?

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