इनदिनों. प्रमोशन में आरक्षण और एट्रोसिटी एक्ट संशोधन के विरूद्ध मोर्चा खोलने वाली सपाक्स ने मध्य प्रदेश के राजनीतिक मैदान में कदम रख दिया है! कहने को तो सपाक्स एमपी की सारी- 230 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि- सपाक्स को कामयाबी कितनी मिलेगी? भावनात्मक रूप से सामान्य वर्ग इन मुद्दों पर सपाक्स के साथ खड़ा है, परन्तु इस भावना को वोट में बदलना इतना आसान नहीं है, अलबत्ता... जीत-हार का तो पता नहीं, किन्तु एमपी विधानसभा चुनाव की सियासी समीकरण जरूर बिगाडे़गी सपाक्स! राजनीतिक जानकार पहली नजर में सपाक्स के कारण भाजपा का नुकसान देख रहे हैं, लेकिन नुकसान तो कांग्रेस को भी होगा? यह नुकसान, किसे? कितना? होता है, इसी पर निर्भर है सारी सियासी समीकरण!

वैसे तो चुनावी मैदान में बसपा, आम आदमी पार्टी आदि भी होंगे लेकिन ये दल कोई बहुत बड़ा फेरबदल कर पाएं, फिलहाल तो ऐसा लगता नहीं है? अभी भी मध्य प्रदेश में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है, यह बात अलग है कि जहां भाजपा-कांग्रेस में बीच कांटे की टक्कर है वहां सपाक्स, बसपा, आप आदि की छोटी गणित भी बड़ा बदलाव ला सकती है! खबरों पर भरोसा करें तो एमपी में एससी तकरीबन 18 प्रतिशत, एसटी लगभग 20 प्रतिशत ओबीसी 51 प्रतिशत है, लिहाजा सपाक्स के लिए संभावनाएं तो बेहतर हैं, किन्तु जमीन पर चुनाव लड़ना इतना आसान भी नहीं है? हो सकता है, कई कांग्रेस-भाजपा कार्यकर्ताओं का साॅफ्ट कार्नर सपाक्स के लिए हो, लेकिन चुनाव में तो वे अपने-अपने राजनीतिक दल के पक्ष में ही खड़े नजर आएंगे!

गांधी जयंती... 2 अक्टूबर 2018, को सपाक्स के नाम से एमपी के सियासी इतिहास में नया पन्ना जुड़ जरूर गया है, परन्तु इस नए पन्ने पर लिखा क्या जाता है, यह तो आने वाले चुनाव के नतीजों में ही साफ होगा?. सपाक्स के सियासी स्वरूप के एलान के साथ ही कार्यकारिणी की भी घोषणा कर दी गई, जिसके तहत- अब हीरालाल त्रिवेदी सपाक्स के अध्यक्ष हैं तो उनके साथ पार्टी में चार उपाध्यक्ष बनाए गए हैं- के एल साहू, वीणा घाणेकर, राजीव खंडेलवाल और विजय वाते. सपाक्स का चुनाव चिन्ह तो चुनाव आयोग की स्वीकृति के बाद ही सामने आएगा, किन्तु सपाक्स ने मध्य प्रदेश में अपनी प्रभावी मौजूदगी दिखा कर कांग्रेस-भाजपा को बेचैन तो कर ही दिया है, बोले तो... नींद उड़ा दी है!

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