प्रदीप द्विवेदी. क्या प्रादेशिक चुनावों के बाद पीएम मोदी टीम का एकाधिकार खत्म हो जाएगा? इनदिनों. क्या एमपी, राजस्थान, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में होने जा रहे प्रादेशिक चुनावों के बाद पीएम मोदी टीम का एकाधिकार खत्म हो जाएगा? यह सवाल इसलिए है कि पीएम मोदी टीम के लगातार किए जा रहे विभिन्न निर्णयों के कारण जहां गैरभाजपाइयों के स्वर बुलंद होते जा रहे हैं वहीं भाजपा के भीतर भी अब बेचैनी बढ़ रही है! नतीजा? जहां बगैर कुछ खास किए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मजबूत होते जा रहे हैं वहीं भाजपा के भीतर राजनाथ सिंह का कद लगातार बढ़ता जा रहा है! इन प्रादेशिक चुनावों में मोदी मैजिक दाव पर है, क्योंकि इन चुनावों में तकरीबन सारे मुद्दे केन्द्र से जुड़े हैं और यदि जनता भाजपा को नकार देती है तो इसका मतलब यह होगा कि जनता पीएम मोदी टीम के कामकाज से संतुष्ट नहीं है? ऐसी स्थिति में 2019 के लिए भाजपा को नए नेतृत्व की जरूरत होगी!

वर्ष 2014 के आम चुनाव तक भाजपा के पास नेतृत्व के नाम पर पीएम नरेन्द्र मोदी के अलावा लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह, शिवराज सिंह चैहान, वसुंधरा राजे सहित तकरीबन आधा दर्जन पहली पंक्ति के नेता थे, लेकिन केन्द्र में पीएम मोदी की सरकार बनने के बाद भाजपा पर लगातार पीएम मोदी टीम का एकाधिकार बढ़ता गया, नतीजा? एक से दस तक केवल पीएम मोदी का ही नाम रह गया! यूपी विधानसभा चुनाव तक यह स्थिति बनी रही, जब मोदी मैजिक सर्वोच्च स्तर पर था, परन्तु गुजरात विधानसभा चुनाव से इस जादू का असर खत्म होने लगा? पहले गुजरात चुनाव में जैसे-तैसे भाजपा की सत्ता बची तो उसके बाद हुए विभिन्न उपचुनावों में भाजपा को अधिकतर जगहों पर हार ही नसीब हुई!

यूपी उपचुनाव में तो सपा-बसपा को मोदी मैजिक का तोड़ ही मिल गया, परिणाम? भाजपा यूपी में एक के बाद एक उपचुनाव हारती गई! कर्नाटक चुनाव के बाद तो पीएम मोदी टीम की पकड़ और भी कमजोर हो गई जिसके नतीजे में 2014 में कायम एक तरफा अनुशासन ढेर हो गया! गैरभाजपाइयों के अलावा शत्रुघ्न सिन्हा जैसे भाजपा नेता भी पीएम मोदी टीम के कामकाज और निर्णयों का खुला विरोध करने लगे? पीएम मोदी पर सीधे धारदार टिप्पणियां करने लगे? यही नहीं, राजस्थान में तो अपनी पसंद का नया भाजपा प्रदेशाध्यक्ष बनाने में केन्द्रीय भाजपा नाकामयाब रही! पीएम मोदी सरकार के तकरीबन चार साल जनहित के कार्यों के बजाय निजी दलहित के कार्यों पर फोकस रहे जिसके कारण जनता का पहले पीएम मोदी के वादों पर से भरोसा टूटा और अब उनके इरादों पर से विश्वास लड़खड़ाने लगा है!

विभिन्न सर्वे भी बता रहे हैं कि पीएम मोदी की लोकप्रियता में लगातार कमी आ रही है, जाहिर है यदि एमपी, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे भाजपा के विशेष असर वाले राज्यों से भाजपा की सत्ता से विदाई हो गई तो पीएम मोदी की टीम के लिए बहुत मुश्किल होगा कि वे भाजपा के भीतर विरोधियों को खामोश रख सकें? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि प्रादेशिक चुनाव जीतें या हारें, बड़ा सवाल यह है कि क्या शिवराज सिंह चैहान, वसुंधरा राजे जैसे नेता, पीएम मोदी के लिए 2014 वाला जोश दिखा पाएंगे? पीएम मोदी टीम के इनसे कैसे सियासी संबंध रहे हैं, यह तो बेहतर तरीके से वे ही जान सकते हैं, लेकिन इतना तय है कि 2014 वाली सियासी सक्रियता फिर-से लाना बहुत मुश्किल है! इस वक्त जो सियासी हालात हैं, यदि कोई चमत्कार नहीं होता है तो भाजपा के लिए 2014 की कामयाबी दोहराना मुश्किल है, और एकल जीत- लोकसभा चुनाव में 272 से ज्यादा सीटें, तो हांसिल करना तो एकदम असंभव है! मतलब... 2019 का चुनाव जीतने के लिए भाजपा को नए नेतृत्व की जरूरत पड़ेगी?

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