क्या अमिताभ बच्चन शुरू से ही राजनीति से दूर रहे हैं? उनकी जिंदगी पर करीब से नजर डालें तो पाएंगे कि राजनीति से उनका कनेक्शन सात दशक पुराना है. नई दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पर 1968 में जनवरी की एक सर्द सुबह अमिताभ बच्चन ने अपने बचपन के दोस्त राजीव गांधी की होने वाली दुल्हन सोनिया माइनो की अगवानी की थी. बच्चन बंधुओं (अमिताभ और अजिताभ) से सोनिया गांधी का तुरंत जुड़ाव हो गया. दोस्ती की यह कहानी आगे भी जारी रही जब राहुल और प्रियंका का जन्म हुआ और बड़े होकर वे अमिताभ को अपना मामू कहने लगे. इसके बाद आई इमरजेंसी. अक्सर संजय गांधी के साथ दिखने वाले अमिताभ बच्चन को मीडिया की आलोचना का शिकार होना पड़ा.

उन 19 महीनों में ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन पर किशोर कुमार के बैन और इमरजेंसी के खिलाफ आवाज उठाने वाले देव आनंद और प्राण के बहिष्कार पर उन्होंने चुप्पी साधे रखी. फिल्म पत्रकारिता को एक कड़े सेंसरशिप से गुजरना पड़ा, उस दौर में अमिताभ बच्चन और जीनत अमान को लेकर गॉसिप को भी बर्दाश्त नहीं किया जा रहा था. संजय गांधी के निधन के बाद राजीव गांधी ने राजनीति में कदम रखा. इसके बाद 1982 में अमितभा बच्चन ने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में एशियन गेम्स के उद्घाटन समारोह में अपनी आवाज से समां बांधा. राजीव फ्रंट रो में बैठे थे और अमिताभ कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे. बोफोर्स पर विवाद के बाद अमिताभ बच्चन ने इलाहाबाद से सांसद के पद से इस्तीफा दे दिया और राजनीति को अलविदा कह दिया.

अमिताभ ने अपना सम्मान बचाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी लेकिन वह राजनीति से अपने संबंध खराब नहीं कर सकते थे. अमिताभ के अलग होने का राजीव को ये नुकसान हुआ कि 1987 में कांग्रेस इलाहाबाद सीट पर उपचुनाव हार गई. इससे बिखरे हुए विपक्ष को अहसास हुआ कि साथ मिलकर वह कांग्रेस को कमजोर कर सकती है. उस दौर में 542 सदस्यीय लोकसभा में कांग्रेस के पास 413 सांसद थे. 1987 से पहले भी गांधी और बच्चन परिवारों के बीच अनबन की खबरें आती रही थीं. 1980 में एक मौका ऐसा भी आया जब इंदिरा ने तेजी बच्चन से अपनी करीबी के बावजूद राज्यसभा सीट के लिए नरगिस को चुना था. इंदिरा गांधी की छोटी बहू मेनका गांधी के संपादन में छपने वाली पत्रिका 'सूर्या' के मुताबिक इंदिरा के इस कदम से तेजी काफी नाराज़ हुई थीं.

हालांकि इंदिरा ने यह कहते हुए अपने फैसले का बचाव किया कि दिग्गज अभिनेत्री इस पद को किसी और की तुलना में अधिक डिजर्व करती हैं. राजीव गांधी हत्या मामले में 27 सालों से जेल में बंद ये लोग कौन हैं? उनके मुताबिक इंदिरा गांधी ने अमिताभ को राजनीति में लाने को लेकर राजीव गांधी को चेताया भी था. अपनी हत्या के कुछ दिन पहले ही इंदिरा ने अपने बेटे राजीव (तब AICC के महासचिव), अरुण नेहरू, राजीव के एक दूर के कजिन और फोटेदार की मीटिंग बुलाई थी. फोटेदार याद करते हैं, इस बैठक में लोकसभा चुनावों पर चर्चा हो रही थी. इस दौरान उन्होंने अपने बेटे से खासतौर पर दो चीज़ें कहीं जो उन्हें भविष्य में कभी नहीं करनी चाहिए." फोटेदार आगे बताते हैं कि इसमें पहली बात थी, "तेजी के बेटे अमिताभ बच्चन को कभी भी चुनावी राजनीति में नहीं लाना."

इंदिरा के करीबीयों का दावा है कि राजीव को उनकी मां की बात पर विश्वास नहीं हुआ, उन्होंने उनसे एक शब्द भी नहीं कहा. फोटेदार ने बताया कि 1984 के लोकसभा चुनाव में अमिताभ बच्चन को पार्टी का टिकट दिया गया. फोटेदार कहते हैं कि वह समझ रहे थे कि इंदिरा अमिताभ को राजनीति में लाने के खिलाफ क्यों हैं, उन्होंने कहा, 'लेकिन राजीव इस पर अड़े रहे तो मैं इस बारे में अधिक बात नहीं करूंगा.' इंदिरा ने राजीव से कहा था कि उन्हें ग्वालियर के पूर्व महाराजा माधवराव सिंधिया से एक हाथ की दूरी बनाकर रखनी चाहिए. फोटेदार कहते हैं, "मुझे रिपोर्ट मिल रही थी कि अमिताभ अधिकारियों के ट्रांसफर और नियु्क्ति में दखल देने लगे थे."

उन्होंने आगे कहा कि पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने प्रशासनिक मसलों पर उनके दखल को लेकर शिकायत की थी. वह आगे बताते हैं, "इलाहाबाद पढ़े-लिखे लोगों, इंटेलेक्चुअल्स, जज और वकीलों का शहर है. लेकिन अमिताभ ने अपने क्षेत्र में काम का जिम्मा एक ऐसे व्यक्ति को दिया जिन्हें लोग गंभीरता से नहीं लेते थे." उन्होंने दावा किया कि अमिताभ के काम करने के तरीके को लेकर उन्होंने कभी भी राजीव गांधी से शिकायत नहीं की. हालांकि अभिनेता कांग्रेस शासित उत्तर प्रदेश ही नहीं मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की सरकारों में भी में दखल देने लगे. फोटेदार उस दौरान राजीव गांधी के राजनीतिक सचिव के तौर पर काम कर रहे थे. उन्होंने दावा किया कि राजीव ने एक बार उन्हें बताया था कि अमिताभ ने एक बार राजस्थान में पार्टी की महिला विंग की अध्यक्ष के तौर पर एक व्यक्ति विशेष की नियुक्त के लिए काफी दबाव बनाया था.

1987 में अपने बचपन के दोस्त से अलग होने के बाद फोटेदार बताते हैं कि उनके लिये यह देखना आश्चर्यजनक था कि उसके बाद जो भी घटनाएं हुई उनमें अमिताभ बच्चन सिर्फ दर्शक नहीं बल्कि उनके 'खिलाड़ी' भी वही थे. राजीव गांधी के राजनीतिक सचिव उस दिन का ब्यौरा देते हैं जिस दिन अमिताभ ने इस्तीफा दिया था: "अमिताभ प्रधानमंत्री से मिलने पहुंचे, दोनों के बीच चर्चा हुई. उस दिन दोपहर करीब 2:45 बजे मैं लंच के लिए निकलने वाला था तभी पीएम ने मुझे बुलाया. अमिताभ उनके साथ थे, हमेशा की तरह सफेद कुर्ता-पायजामा में फब रहे थे. वे लोग 7 रेस कोर्स रोड की तरफ बढ़ रहे थे. मैं अंदर गया. पीएम कुर्सी पर बैठे. अमिताभ उनके दाहिने तरफ बैठे थे और मुझे उनके बाएं तरफ बैठने के लिए कहा गया." फोटेदार आगे कहते हैं, "राजीव ने कहा, "फोटेदार चाहते हैं कि आप इस्तीफा दे दें.

यह मेरे लिए आश्चर्यजनक था... अमिताभ के लिए भी रहा ही होगा." पूर्व पीएम के राजनीतिक सचिव ने बताया कि इस पर अमिताभ का क्या जवाब था: "अगर फोटेदार चाहते हैं कि मैं इस्तीफा दूं तो मैं इस्तीफा देने के लिए तैयार हूं. मुझे पेपर दीजिए, क्या लिखना होगा मुझे" इसके बाद फोटेदार ने राजीव के पर्सनल असिस्टेंट विंसेंट जॉर्ज से कहा कि लोकसभा सदस्य के लेटरहेट वाला नोटपैड लेकर आएं. उन्होंने आगे कहा, "मैंने अमिताभ से कहा: 'आप अपने हाथ से स्पीकर को लिखें कि आप लोकसभा से इस्तीफा दे रहे हैं.' जवाब में अमिताभ ने कहा, 'बस इतना ही?' वह नोट स्पीकर के पास भेजा गया और अभिनेता का इस्तीफा स्वीकार हो गया." राजनीति में अमिताभ की औपचारिक एंट्री उतनी अचानक थी जितने अचानक उनका बाहर जाना हुआ. इंदिरा की हत्या के बाद देश में नए सिरे से चुनाव का आह्वान हुआ. अटल बिहारी वाजपेयी, हेमवती नंदन बहुगना जैसे नेताओं से निबटने के लिए राजीव गांधी को बड़े चेहरे की जरूरत थी.

अरुण नेहरू ने अमिताभ बच्चन के नाम का सुझाव दिया था. इसके बाद फोन पर बात की व्यवस्था की गई. अमिताभ को मनाने के लिए राजीव गांधी को बहुत अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ी.

( आर्टिकल का यह हिस्सा रशीद किदवई की किताब 'नेता अभिनेताः बॉलीवुड स्टार पॉवर इन इंडियन पॉलिटिक्स' से उनकी अनुमति से प्रकाशित किया गया है.)

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