इनदिनों. यह लगभग तय है कि महाराष्ट्र में आगामी लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव, शिवसेना और भाजपा अलग अलग लड़ेंगे! इन कुछ वर्षों में शिवसेना ने पक्ष और विपक्ष, दोनों भूमिकाएं संतुलित ढंग से निभाई हैं, केन्द्र सरकार में भाजपा का सहयोगी दल होने के बावजूद शिवसेना ने भाजपा के विभिन्न निर्णयों पर हमेशा अपनी स्पष्ट प्रतिक्रिया व्यक्त की है? यही वजह है कि देशभर में केन्द्र की भाजपा सरकार से निराश भाजपा समर्थक शिवसेना को उम्मीदभरी नजरों से देख रहे हैं!

दरअसल, देश के मतदाता अपने विचारों के सापेक्ष राजनीतिक दलों की ओर झुकाव रखते हैं, कभी कांग्रेस की नीतियों से सहमत लोग वोटों की राजनीति के चलते तुष्टीकरण की नीति के कारण कांग्रेस से दूर होकर भाजपा की ओर चले गए? लेकिन, इन चार वर्षों में केन्द्र की भाजपा सरकार भी वोटों की राजनीति के चलते अपने मूल स्वरूप से अलग तुष्टीकरण की नीति पर उतर आई, अब वे समर्थक परेशान हैं कि वे कहां जाएं? कांग्रेस के पास जाना नहीं है और भाजपा के साथ रहना नहीं है! ऐसे मतदाताओं के लिए दो ही विकल्प हैं- नोटा या शिवसेना!

लेकिन, इसमें परेशानी यह है कि शिवसेना, महाराष्ट्र से बाहर विस्तार की कोई प्रभावी पहल नहीं कर रही है? यही नहीं, भाजपा से नाराज और अलग हो गए सियासी समूहों से भी शिवसेना का कोई विशेष संवाद नहीं है!

जैसे, राजस्थान में प्रमुख नेता घनश्याम तिवाड़ी ने भाजपा से अलग अपना राजनीतिक दल गठित कर लिया है और अगले विधानसभा चुनाव में भी लडऩे की तैयारी है, परन्तु उन्हें प्रत्यक्ष/परोक्ष सहयोग देने वाले सियासी समूहों के साथ उनका कोई विशेष संवाद नहीं है? किश्तों में भाजपा से बगावत, बगावत करने वालों को निराशा ही देगी! 

भाजपा और शिवसेना, दोनों के अलग-अलग लडऩे का असर दोनों पर पड़ेगा, लेकिन इसका पहला बड़ा शिकार भाजपा इसलिए बनेगी कि महाराष्ट्र में पहले लोकसभा चुनाव हैं और केन्द्र की भाजपा सरकार को बचाने में महाराष्ट्र का बहुत बड़ा योगदान हो सकता है, लेकिन अलग लडऩे के कारण पुरानी सीटें बचाना भी भाजपा के लिए भारी है? हो सकता है लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद चुनावी हकीकत नए सिरे से शिवसेना-भाजपा को एक मंच पर ले आए, और तब उसी दल की शर्तो पर गठबंधन होगा जिसका बड़ा असर लोकसभा चुनाव में नजर आएगा!

शिवसेना लंबे समय से भाजपा से इसलिए भी नाराज चल रही है कि उसे लग रहा है कि उसका वोट बैंक लगातार भाजपा की ओर खिसक रहा है और आगे भी साथ बना रहा तो शिवसेना का आधार ही खत्म होता चला जाएगा?

इस वक्त तक भाजपा की सहयोगी पार्टी शिवसेना के तेवर लगातार सख्त होते जा रहे हैं. लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव से तो दूरी बनाई ही थी और उस दौरान शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने सामना को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि... शिव सेना किसी एक पार्टी की दोस्त नहीं है. उसकी दोस्ती जनता के साथ है और जनता के लिए वे काम करते रहेंगे. उन्होंने कहा कि जो बात मुझे नहीं पसंद होगी, उसके बारे में अपनी बेबाक राय रखता रहूंगा?

हम भारतीय जनता पार्टी के नहीं, बल्कि भारतीय जनता के मित्र हैं? इसी अंदाज में शिवसेना के मुखपत्र सामना को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि... मैं मोदी के सपनों के लिए नहीं आम जनता के सपनों के लिए लड़ रहा हूं! 

उन्होंने कहा कि हम भारतीय जनता पार्टीं के नहीं बल्कि भारतीय जनता के मित्र हैं. शिव सेना लोगों के हित में सरकार पर अंकुश लगाने का काम कर ही है और चार साल पहले जो बात वो अकेले कहते थे, आज उसे सभी लोग मान रहे हैं. विरोध के बाद भी सरकार में बने रहने? के सवाल पर ठाकरे ने कहा कि इसका इस्तेमाल जनता की भलाई में कर रहे हैं!

अपना नजरिया साफ करते हुए उद्धव ठाकरे का कहना था कि... हमने सरकार की किसी नीति का विरोध किया तो किसी व्यक्तिगत द्वेष के कारण नहीं, बल्कि देश की जनता के हित के लिए ऐसा किया है... शिवसेना ने जो किया छिपकर नहीं किया, खुलकर समर्थन किया और खुलकर ही विरोध भी किया! उन्होंने यह भी कहा कि शिकार तो वही करेंगे लेकिन इसके लिए वह दूसरों की बंदूक का इस्तेमाल नहीं करेंगे?

अभी भारत बंद के दौरान शिवसेना ने विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती कीमतों में इजाफे के खिलाफ  बुलाया गया राष्ट्रव्यापी बंद लंबी नींद से हाल में जागे लोगों का अचानक उठाया गया कदम नहीं लगाना चाहिए? शिवसेना का कहना है कि वह लंबे समय से विपक्षी दलों का बोझ अपने कंधों पर उठाती आ रही है और अब यह देखना चाहती है कि ये संगठन जनता से जुड़े मुद्दों पर कहां खड़े हैं? शिवसेना ने अपने मुखपत्र- सामना के संपादकीय में कहा कि... अब तक हम विपक्षी नेताओं का बोझ अपने कंधों पर उठाते आ रहे हैं और अब हम विपक्ष की ताकत देखना चाहते हैं? जब विपक्षी पार्टियां प्रभावशाली ढंग से अपना काम कर रही हों तो ही लोगों के हितों की रक्षा होती है!

बहरहाल, भाजपा-शिवसेना के बीच अघोषित तौर पर गठबंधन समाप्त हो चुका है, बस औपचारिक घोषणा करने की देरी है! शिवसेना के बगैर वर्ष 2014 की कामयाबी दोहराना भाजपा के लिए संभव नहीं है?

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