नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने साफ निर्देश दिया है कि एक बार तलाक हो जाने के बाद पत्नी अपने पति या उसके परिजनों के खिलाफ दहेज का मामला दर्ज नहीं कर सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498A या दहेज निषेध अधिनियम के किसी भी प्रावधान के तहत, दंपति के अलग होने के बाद अभियोजन बिल्कुल टिकाऊ नहीं रहेगा. दहेज उत्पीड़न मामले में 5 साल की मिलती है सजा बता दें कि दहेज के प्रावधानों के तहत जुर्माने के साथ साथ अधिक से अधिक 5 साल जेल का प्रावधान है. जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस एल नागेश्वर राव ने आईपीसी की धारा 498ए के कई शब्दों पर जोर दिया.

इसके बाद पीठ ने कहा कि जब किसी मामले में पति-पत्नी का तलाक हो चुका हो तो वहां धारा 498ए नहीं लागू हो सकती. इसी तरह से दहेज निषेध अधिनियम 1961 की धारा 3/4 के तहत भी मामला दर्ज नहीं हो सकता है. अदालत ने यह बात एक मामले की सुनवाई करते हुए कही. दरअसल एक शख्स और उसके परिजन पीठ के समक्ष एक मामला लेकर पहुंचे थे जिसमें धारा 498ए और दहेज निषेध अधिनियम के तहत उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने को कहा गया था. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साल 2016 में उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में दर्ज एफआईआर को रद्द करने के लिए दायर की गई उनकी याचिका खारिज कर दी थी. अदालत में पूर्व पति ने लगाई गुहार अदालत में पूर्व पति और उसके कुछ रिश्तेदार पीठ के समक्ष पहुंचे थे. उन लोगों ने बताया कि दंपति के बीच तलाक को चार साल हो चुके हैं ऐसे में मामला तर्कसंगत नहीं है. अदालत ने कहा कि इस बहस में ज्यादा वास्तविकता है.

वहीं पीठ ने कहा महिला के कथन के मुताबिक उनका चार साल पहले तलाक हो चुका है, हम इस मत के हैं कि मामला आईपीसी की धारा 498ए और दहेज निषेध अधियनिम 1961 की धारा 3/4 के तहत तर्कसंगत नहीं है.’ इसके बाद दहेज प्रताड़ना के मामले में आरोपी पति सहित सभी लोगों के खिलाफ मामला रद्द कर दिया गया. क्या हैं आईपीसी की धारा 498 ए ? हमारे देश में अस्सी के दशक में दहेज को लेकर महिलाओं को प्रताड़ित किया गया. जिसके बाद तमाम संगठनों ने दहेज हत्याओं के ख़िलाफ़ भी जबरदस्त आवाज़ उठाई. तमाम आंदोलनों के बाद भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में ‘498-ए’ वजूद में आया. धारा 498-ए यानी किसी महिला पर शौहर या शौहर के रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता करने की हालत में बचाने वाला क़ानून. दहेज निषेध अधिनियम 1961 क्या हैं ? दहेज निषेध अधिनियम 1961के अनुसार दहेज लेने, देने या इसके लेन-देन में सहयोग करने पर 5 वर्ष की कैद और 15,000 रुपए के जुर्माने का प्रावधान है.

दहेज के लिए उत्पीड़न करने पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए जो कि पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा अवैधानिक मांग के मामले से संबंधित है, के अन्तर्गत 3 साल की कैद और जुर्माना हो सकता है. धारा 406 के तहत लड़की के पति और ससुराल वालों दहेज वापस करने के लिए मना करते है तो ऐसे में 3 साल की कैद और जुर्माना दोनों है.

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