इनदिनों. एसी-एसटी एक्ट संशोधन के मुद्दे पर सियासी दल संकट में आ गए हैं, खासकर केन्द्र की मोदी सरकार की परेशानी इसलिए बढ़ गई है कि सामान्य वर्ग भाजपा का मतदाता ही नहीं, प्रेरक वर्ग भी था? 

इस वक्त भाजपा के समर्थक सामान्य वर्ग के मतदाता इसलिए धर्मसंकट में हैं कि वे कांग्रेस को मौका देना नहीं चाहते हैं और वर्तमान सियासी माहौल में भाजपा को अवसर दे नहीं सकते, लिहाजा... इस दिशा में नई सोच उभर रही है!

राजस्थान के प्रमुख ब्राह्मण नेता और जनचेतना मंच के राष्ट्रीय संयोजक अश्विनी तिवारी का सवर्ण सत्याग्रह की भावना का समर्थन करते हुए कहना हैं कि आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों से पूर्व देश के सभी प्रदेशों में जनचेतना मंच की राज्य इकाइयों का गठन किया जायेगा एवं देश में निवास कर रहे सभी धर्म, जाति एवं वर्गों के लोगों को आपस में उलझाने वाले वर्तमान लोकसभा के सभी सदस्यों को हराने के लिये जन-जागरण किया जायेगा.

तिवारी का साफ कहना है कि वे किसी भी राजनीतिक दल के विरोधी अथवा समर्थक  नहीं हैं, भारत में सामान्य, ओबीसी, अल्पसंख्यक, एससी, एसटी आदि हर जाति और वर्ग के लोग आपसी सहयोग भाव से रहते आये हैं, परन्तु वर्तमान लोकसभा में प्रतिनिधित्व कर रहे सभी राजनैतिक दलो के संासदो ने एससी-एसटीएक्ट के गैरकानूनी स्वरूप मौन समर्थन जारी रखते हुए देश में आपसी सद्भाव के वातावरण को प्रभावित करने का प्रयास किया है, इसलिए ऐसे सभी ससंद सदस्यों को पुन: लोकसभा में प्रवेश करने से रोका जाएगा और यदि वर्तमान लोकसभा के सांसद अपने मौन समर्थन के कार्य हेतु सार्वजनिक रूप से माफी मांगते हैं तो उन्हें अगली लोकसभा में इस संशोधन का विरोध करने की शर्त पर ही माफ कर समर्थन दिया जायेगा! तिवारी का कहना है कि राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि अपना नेता और नीतियां बदलें अन्यथा जनसमर्थन नही मिल पायेगा? 

तिवारी का कहना है कि देश में स्वत: हुआ बन्द इस बात का संकेत है कि देश की आजादी के बाद सात दशक से अधिक समय से सभी धर्मो, जातियों एवं वर्गों के हित सरंक्षण के कानून बनाकर और व्यवस्थाएं कर सभी के सुख-दुख में हमकदम रहा सामान्य वर्ग राजनैतिक दलों की चालबाजियों को समझ रहा है, लेकिन उनके द्वारा वोट बैंक बनाने के लिए की जा रही गंदी राजनीति का शिकार नही होगा! 

तिवारी ने कहा कि आजादी के बाद सामान्य वर्ग के जिन लोगों ने देश को नेतृत्व दिया उन्होंने कभी भेदभाव नहीं किया, परन्तु वर्तमान में सत्ता के इर्दगिर्द मंडरा रहे  सभी राजनैतिक दलों ने वोटों की राजनीति कर समाज में बिखराव करने का प्रयास किया है. 

तिवारी का कहना है कि आजादी के सत्तर साल, अंग्रेज शासन के दो सौ साल, मुगल शासकों अनेक वर्षों के दौरान किसी जाति-समाज का वर्चस्व नहीं रहा और देश के निवासियो को समान रूप से व्यवस्थाओं में जीना पड़ा हैं, इसलिए किसी भी समाज या जाति को अनावश्यक रूप से प्रताडि़त करने की बात तथ्यहीन है! 

मंच के सलाहकार मण्डल के सदस्य विभिन्न समाजों के वरिष्ठ नेताओं- दुर्गाशंकर व्यास, रतनशंकर गौतम, राजेन्द्र द्विवेदी, पुरूषोत्तम शुक्ला, मुकेश शर्मा, संजय शुक्ला, मनु पाठक, रमेश ओझा, मोहन शर्मा, भीमसिहं जैन, राजीव पाटनी, धनपत फोफलीया आदि के मार्गदर्शन और सरंक्षण में मंच की गतिविधियों और कार्यक्रमों का संचालन करने रूपरेखा बनाई जा रही है.  

तिवारी के अनुसार आजादी के समय की स्थिति व वर्तमान स्थिति में काफी बदलाव आया हैं और संविधान में तय किये गए सभी प्रावधानों पर विचार और समीक्षा की आवश्यकता महसूस की जा रही है, परन्तु राजनैतिक दलों की सिर्फ सियासी रोटियां सेंकने की नीति के चलते देश में सामाजिक सौहार्द का वातावरण प्रभावित हो रहा है. जनहित के कई मामलों को टालने के लिए सरकार कोर्ट के निर्णय की बात करती है, लेकिन अपने सियासी फायदे के मुद्दों पर कोर्ट के फैसलों को बदलने ससंद के बहुमत का दुरूपयोग करती हैं? 

आर्थिक पिछड़ा आयोग की रिपोर्ट को देखने की फुर्सत केन्द्र की किसी सरकार को दो दशक में भी नही मिलती है? परन्तु, एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले तुरन्त पलट दिये जाते हैं? हिन्दू समाज को आपस में गुत्थमगुत्था करने की जो व्यवस्थाएं राजनैतिक दलों की मेहरबानी से बनती जा रही हैं, वे ठीक नही हैं? सुप्रीम कोर्ट द्वारा राम मन्दिर बनाने के मामले में कोई भी निर्णय की स्थिति में क्या फिर ससंद के माध्यम से नया कानून बनाने के लिए इस व्यवस्था का उपयोग होगा? 

तिवारी ने कहा कि सरकार सभी के समर्थन से बनती है तो कुछ लोगों के वोट हासिल करने देश व समाज हित को क्यो उपेक्षित किया जाता है? 

सवर्ण सत्याग्रह की भावना का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि सामान्य वर्ग, ओबीसी, अल्पसंख्यक, एससी, एसटी आदि के सभी लोग भारत के नागरिक हैं और सभी समाजों के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को मदद व राहत की जरूरत है अत: सरकार समान दृष्टिकोण के साथ काम करने का प्रयास करे. आरक्षण के दायरे के जो लोग इसका लाभ लेकर अच्छी स्थिति में आ चुके हैं उन्हें इस दायरे से बाहर किया जाना चाहिए ताकि उसी वर्ग के कमजोर लोगों को भी आगे आने का अवसर मिल सके? आरक्षित वर्ग के आयकरदाता लोगों को आरक्षण के दायरे से स्वयं बाहर आने की पहल करनी चाहिए ताकि उनके वर्ग के अन्य पिछड़े लोग भी लाभान्वित हो सकें! 

इसी तरह सरकार को आर्थिक रूप से कमजोर सभी धर्म, समाजोड्ड व वर्गों के लोगों को राहत देने की नीति बनानी चाहिए. 

तिवारी का कहना है कि देश के लगभग सभी क्षेत्रो में सभी धर्मो, जातियों और वर्गो के लोग शांति से रहते आये हैं और वर्तमान में रह रहे हैं, परन्तु राजनैतिक दल इस शांति को क्यों प्रभावित करना चाहते हैं? यह समझ से परे है! सामान्य वर्ग किसी आरक्षित वर्ग का विरोधी नहीं हैं और न ही होगा, परन्तु सामान्य वर्ग के जरूरतमन्द गरीबों को भी राहत दी जाए यह आज की आवश्यक है? 

जाहिर है, सियासी स्वार्थ की सीमाएं लांघ कर सभी राजनीतिक दल और राजनेता सामान्य वर्ग के निशाने पर आ गए हैं, यदि समय रहते अपनी भूल सुधारते हुए इन नेताओं ने न्याय का साथ नहीं दिया तो अपने लिए ही परेशानियां पैदा करेंगे?

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