पलपल संवाददाता, जबलपुर. मप्र उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस के साथ ही आरटीआई एक्टिविस्ट रामचन्द्र हाल ही में जिला एवं खाद्य आपूर्ति विभाग में सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में विभाग द्वारा दिए गए जवाब से हैरत में हैं. जिला आपूर्ति विभाग में उन्होंने 7 जुलाई को आवेदन दिया था इस उम्मीद में कि निर्धारित अवधि में विभाग जानकारी दे देगा लेकिन सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत निर्धारित 30 दिन की अवधि के बाद एक माह अतिरिक्त बीत जाने के बाद खाद्य आपूर्ति अधिकारी जवाब देने के बजाए अब आरटीआई एक्टिविस्ट से कारण पूछ रहे हैं कि वे ये सूचनाएं क्यों जानना चाह रहे हैं.

हैरानी की बात यह है कि सूचना के अधिकारी अधिनियम के तहत अधिवक्ता द्वारा दिए गए आवेदन के बाद लगातार विभागीय कर्मचारी उनसे लगातार निवेदन करते रहे कि सूचनाएं जल्द से जल्द प्रदत्त कर दी जाएंगी लेकिन सूचना देने के बजाए यह पत्र थमा कर विभाग सूचना प्रेषित करने से आरोपित तौर पर बचने का प्रयास कर रहा है.

यह मांगी है जानकारी

आरटीआई एक्टिविस्ट ने 9 आवेदनों के जरिए यह सूचनाएं मांगी हैं

- अप्रैल 2015 से जून 2016 तक की अवधि में मिट्टी तेल (कैरोसिन) के भाव निर्धारण आदेश एवं पत्रकों की छायाप्रत्रि

- अप्रैल 2015 से जून 2016 तक की अवधि में डीलरवार एवं राशन दुकानवार कैरोसिन आवंटन जबलपुर की संपूर्ण जानकारी

- अप्रैल 2015 से जून 2016 तक की अवधि में कैरोसिन के थोक डीलरों से प्राप्त साप्ताहिक विवरणी नोटशीट सहित

- अप्रैल 2015 से जून 2016 तक की अवधि तक जबलपुर जिले में पैट्रोल पंपों, गैस एजेंसियों, होटल, हलवाईयों एवं अनय अनियमितताएं करने वालों के विरुद्ध दर्ज प्रकरणों से संबंधित रजिस्टर की छायाप्रति

- अप्रैल 2015 से जून 2016 तक जबलपुर नगर के के अंतर्गत शासकीय उचित मूल्य दुकानों के प्रकरणों की छायाप्रति

- अप्रैल 2015 से जून 2016 तक की अवधि में शासन से प्राप्त इलैक्ट्रॉनिक तौल कांटों से संबंधित आदेशों, पत्रों, बिल एवं संपूर्ण वाउचर का विवरण

- जनवरी 2017 से जून 2018 तक संधारित आवक रजिस्टर, जावक रजिस्टरों तथा डाकबुकों की संपूर्ण जानकारी

- वर्तमान में लिपिक के पद पर पदस्थ श्री राजेंद्र बैन की प्रथम नियुक्ति पत्र श्री बैन की शैक्षणिक योज्यता, जाति प्रमाण पत्र सहित अन्य दस्तावेज, पदोन्नति तथा कार्य विभाजन से संबंधित आदेश एवं पत्रों की संपूर्ण विवरणी

आपूर्ति नियंत्रक जानना चाह रहे कारण

सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने वाले आरटीआई एक्टिविस्ट एडवोकेट रामचंद्र को कार्यालय खाद्य शाखा से सूचना मांगी जाने की तिथि के ठीक दो माह बाद 7 सितंबर को पत्र कं्रमांक 655/खाद्य/2018 में खाद्य नियंत्रक ने उनसे सवाल पूछा है कि वे बताएं कि इन जानकारियों के पीछे उनका प्रयोजन क्या है.

इसलिए नहीं दी जानकारी

विभागीय सूत्रों के अनुसार 9 बिंदुओं पर आरटीआई एक्टिविस्ट द्वारा मांगी गई जानकारियों को देने में विभागीय कर्मचारियों और अधिकारियों के पसीने छूट रहे हैं वे किसी तरह से भी जानकारी देने से बचना चाह रह हैं. विभागीय सूत्रों की माने तो यदि जानकारी दे दी जाती है तो विभाग के एक दो नहीं बल्कि आधा दर्जन अधिकारियों कर्मचारियों पर कार्रवाई की गाज ही नहीं नौकरी पर भी बन सकती है.

सूचना क्यों चाहिए, कारण बताना जरूरी नही

सूचना के अधिकार के नियम के सूचना क्यों चाहिए इसका प्रयोजन बताया जना बिल्कुल जरूरी नहीं. कोई कारण या अन्य सूचना केवल संपर्क विवरण (नाम, पता, फोन नंबर) के अतिरिक्त देने की ज़रूरत नहीं है. सूचना क़ानून स्पष्टत: कहता है कि प्रार्थी से संपर्क विवरण के अतिरिक्त कुछ नहीं पूछा जाएगा.

सूचना ना देने पर अधिकारी को सजा

स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार कोई क़ानून किसी अधिकारी की अकर्मण्यता/लापरवाही के प्रति जवाबदेही तय करता है और इस क़ानून में आर्थिक दंड का भी प्रावधान है. यदि संबंधित अधिकारी समय पर सूचना उपलब्ध नहीं कराता है तो उस पर 250 रु. प्रतिदिन के हिसाब से सूचना आयुक्त द्वारा जुर्माना लगाया जा सकता है. यदि दी गई सूचना ग़लत है तो अधिकतम 25000 रु. तक का भी जुर्माना लगाया जा सकता है. जुर्माना आपके आवेदन को ग़लत कारणों से नकारने या ग़लत सूचना देने पर भी लगाया जा सकता है. यह जुर्माना उस अधिकारी के निजी वेतन से काटा जाता है.

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