हमारे हिन्दू धर्म में किये जाने वाले प्रमुख उपवासों में से एक माना जाता है हरतालिका तीज, जिसे महिलाएं बड़े ही श्रद्धा के साथ मनाती हैं. भादौ मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरतालिका तीज मनाई जाती है. गणेश चतुर्थी के एक दिन पहले हरतालिका तीज मनाई जाती है. इस साल हरतालिका तीज 12 सितंबर को मनाई जाएगी. वहीं गणेश चतुर्थी 13 सितंबर को मनाई जाएगी. इस बार प्रात: काल पूजन के लिए महिलाओं को सिर्फ 2 घंटे 29 मिनट का समय मिलेगा. प्रात:काल मुहूर्त सुबह 06:04 बजे से 08:33 बजे तक है.

बता दें कि हरतालिका तीज व्रत को सभी व्रतों में सबसे बड़ा व्रत भी माना जाता है और इसे एक उत्सव की तरह लोग सेलिब्रेट करते हैं. इस खास पर्व को लोग भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को ही करते हैं. इसे खासकर के शादीशुदा महिलाएं व कुंवारी लड़कियां दोनों ही सच्चे भाव के साथ करती हैं.

किसकी होती है पूजा

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस व्रत में भगवान शिव, माता गौरी और श्री गणेश की पूजा की जाती है. यह तीज निर्जला और निराहार होता है और महिलाएं रात भर जागकर भगवान के गीत गाती है और व्रत को सम्पूर्ण करती है. इस विशेष दिन भगवान शिव और माँ गौरी की मिट्टी की मूर्ति बनायी जाती है और उन्हें पूजा जाता है. यही नहीं, स्त्रीयां उनसे अच्छे पति और संतान के सुख के लिए प्रार्थना भी करती है.

“हरतालिका” शब्द का क्या है अर्थ

पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती भगवान् शिव जी को अपने पति रूप में पाना चाहती थी, जिसके लिए उन्होंने कठिन तपस्या की थी लेकिन उस समय पार्वती जी की सहेलियों ने उन्हें अगवा कर लिया था. “हरत” का अर्थ है “अगवा  करना” एवं “आलिका” का अर्थ है “सहेलियां” अर्थात सहेलियों द्वारा अपहरण करना ही हरतालिका कहलाता है और इसी कारण इस व्रत को हरतालिका का नाम दिया गया है. बता दें कि यह खास व्रत शिव जी जैसा पति पाने के लिए ही कुंवारी कन्याएं भी बड़ी श्रद्धा के साथ करती हैं.

दरअसल, हरतालिका तीज भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को ही मनाई जाती है, जो अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से अगस्त और सितंबर के महीने में आती है. इस खास व्रत को गौरी तृतीया व्रत के नाम से भी जाना जाता है.

जैसा कि हमने पहले बताया कि सुहागन स्त्रियों और कुंवारी कन्यायों के लिए यह व्रत बहुत खास होता है इसलिए इसकी विधि आम पूजाओं से थोड़ी भिन्न और कठिन भी होती है.

हरतालिका तीज का महत्व:

ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को पहली बार मां पार्वती ने भगवान शंकर को प्राप्त करने के लिए किया था. उनके पिता की इच्छा कुछ और थी लेकिन मां पार्वती के मन मंदिर में भगवान शिव बस चुके थे और इसलिए उन्होंने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और कठोर तपस्या शुरू कर दी. इस दौरान मां पार्वती ना तो कोई अन्न ग्रहण किया और ना ही जल ग्रहण किया. इसलिए यह माना जाता है कि इस व्रत में अन्न जल ग्रहण नहीं करना चाहिए. मां पार्वती की कठोर तपस्या को देखकर भगवान शंकर उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया.

सितम्बर में भादौ मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाने वाला हरतालिका तीज का पर्व करवाचौथ से भी ज्यादा कठिन व्रत होता हैं, यह त्यौहार महिलाये अपने अखंड सुहाग के लिए रखती हैं और कुवारी कन्याएं मनचाहा वर पाने के लिए इस व्रत को करती हैं.

हरतालिका तीज को करने का सही नियम

• विशेष प्रकार के फूलों से सजा फुलेरा

• गीली काली मिट्टी और बालू रेत

• केले के पत्ते

• सभी प्रकार के फल और फूल पत्ते

• बेल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, अकांव का फूल, मंजरी

• जनैव, नाडा, वस्त्र

• माता गौरी के लिए सुहाग का पूरा सामान

• घी, तेल, दीपक, कपूर, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, चन्दन, श्री फल, कलश

• पंचामृत के लिए  घी, दही, शक्कर, दूध शहद

हरतालिका तीज की पूजा विधि

• सबसे पहले पूजा के लिए मिट्टी और बालू रेत से भगवान शिव, माता पार्वती और श्री गणेश की प्रतिमा बनाएं.

• उसके बाद फुलेरा बनाकर उसे सजायें.

• उसके अंदर रंगोली डालकर उसपर पट्टा या चौकी रखें.

• चौकी पर सातिया बनाएं और उस पर थाली रखें.

• अब उस थाल में केले के पत्ते रखें.

• तीनो प्रतिमाओं को केले के पत्तों पर आसीत करें.

• किसी लौटे या घड़े पर श्रीफल रखकर घड़े के मुख पर नाडा बांध दें.

• व साथ ही उसपर सातिया बनाकर अक्षत चढ़ाएं और दीपक जलाएं.

• कलश पूजन हो जाने के बाद श्री गणेश का पूजा करें.

• और इसके बाद भगवान शिव का पूजन करें और फिर माता गौरी पर पूरा श्रृंगार चढ़ाकर उनका भी पूजन करें.

• पूजन समाप्त होने के पश्चात् हरतालिका की कथा अवश्य पढ़ें.

• उसके बाद आरती करें, जिसमे सबसे पहले भगवान गणेश की आरती, फिर शिव जी की आरती और फिर माँ गौरी की आरती गायें.

• पूजा के बाद भगवान की परिक्रमा करके उनका आशीर्वाद लेना ना भूलें.

• रात भर जागकर पांच पूजा व् आरती याद से करें.

• प्रातःकाल आखिरी पूजा के बाद माँ गुजरी पर सिंदूर चढ़ाया जाता है, जिसे सुहागन स्त्रियां लेती है.

• साथ ही ककड़ी व् हलवे का भोग भी लगाया जाता है जिसके बाद ककड़ी खाकर उपवास का पारण किया जाता है.

हरतालिका तीज व्रत से जुड़े खास नियम

• इस व्रत को निर्जला और निराहार ही किया जाता है. सूर्योदय से लेकर अगले दिन के सूर्योदय तक अन्न-जल ग्रहण नहीं किया जाता है.

• इस हरतालिका व्रत को कुंवारी कन्याएं और सुहागन स्त्रियां दोनों करती हैं.

• बता दें कि इस व्रत का विशेष नियम होता है जिसके अनुसार एक बार प्रारंभ करने के बाद यह व्रत छोड़ा नहीं जाता है. हर साल पुरे नियम और विधान के साथ इस व्रत को किया जाता है.

• इस खास दिन रतजगा भी किया जाता है. सभी महिलाएं एकत्रित होकर भजन कीर्तन करती है और नए वस्त्र पहनकर पूरा श्रृंगार भी करती हैं.

हरतालिका तीज के व्रत से जुड़ी कुछ दिलचस्प मान्यताएं इस प्रकार है

• जो भी महिला इस व्रत के दौरान सोती है वह अगले जन्म में अजगर बनती है.

• जो दूध ग्रहण करती हैं वह सर्पिनी बनती है.

• जो व्रत नहीं करती वह विधवा बनती है.

• जो शक्कर खाती है वह मक्खी बनती है.

• जो मांस-मछली आदि खाती है वह शेरनी बनती है.

• जो जल का सेवन करती है वह मछली बनती है.

• जो अन्न खाती है वह सुअरी बनती है.

• जो फलों का सेवन करती है वह बकरी बनती है.

ध्यान दें कि यह सभी केवल सामाजिक और धार्मिक अवधारणायें ही है और इनका वास्तविक जीवन पर कोई प्रभाव नहीं होता है. इसलिए आप जिस तरह इस व्रत को अब तक करते आ रहे हैं उसी प्रकार करें.

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