मोगा. चावलों की बादशाह भारतीय बासमती की विदेशों में मांग हमेशा ही ऊंची रही है. यूरोपियन यूनियन में बासमती गुणवत्ता नियम सख्त होने पर अमेरिका के बाद अन्य देश की ओर से भारत की ओर से भेजी बासमती काफी मात्रा में वापस आने से जहां निर्यातक चिंता में हैं वहां पंजाब में किसानों को भी झटका लगा सकता है. किसानों की ओर से कीटनाशक का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करने और नियमों में सख्ती कारण भारतीय बासमती चावल की बिक्री में मुश्किलों की खबरों बाद पंजाब कृषि एवं किसान भलाई विभाग ने बासमती काश्तकार किसानों को जागरूक करने के लिए सचिव खेतीबाड़ी काहन सिंह पन्नू ने विभाग के क्षेत्रीय आधिकारियों को सितंबर माह से मुहिम शुरु करने के लिए हिदायतें जारी की हैं. 

जिले के मुख्य कृषि अफसर डॉ. परमजीत सिंह बराड़ ने कि बासमती चावलों में ऐसीफेट, कार्बेन्डाजिम, थायोमिथाकसम, ट्राईजोफास और ट्राईसायक्लाजोल दवाओं के अंश निर्धारित मात्रा से अधिक पाए जाने कारण बासमती चावलों को विदेशों में भेजने में समस्या पेश आर ही है. इसके अलावा किसानों को बासमती का रेट भी पूरा मिलने में भी मुश्किल आ सकती है. उन्होंने ‘मिशन तंदरुस्त पंजाब’ के तहत किसानों को बासमती फसल पर उक्त दवाओं का प्रयोग बिल्कुल न करने की सलाह देते कहा कि जरूरत पडऩे पर बीमारी की रोकथाम के लिए कृषि माहिरों की सलाह से वैकल्पिक दवाएं इस्तेमाल में की जाएं जो बासमती चावलों की गुणवता अंतरराष्ट्रीय स्तर की बनी रह सके. उन्होंने कहा कि बासमती पकने समय आखिरी तीन से चार सप्ताह दौरान किसी भी खेती दवा का इस्तेमाल करने से गुरेज किया जाये, क्योंकि इस समय इस्तेमाल की दवाओं का फसल के दाने पर प्रभाव रह जाता है, इस कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में बासमती चावल बरामदगी में मुश्किले आ रही हैं.

खेती माहिर पुरुस्कार विजेता डॉ.जसविंदर सिंह बराड़ ने कहा कि कृषि यूनिवर्सिटी सिफारिशों पर किसानों को विभाग की ओर से जागरूक करने के बावजूद किसान धान एवं बासमती फसलों पर ज्यादा कीटनाशकों का प्रयोग कर रहे हैं, जिसका प्रभाव चावलों पर भी आरहा है. उन्होंने कहा कि इस संबंध में किसानों को खुद जागरूक होने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि आर्सेनिक वातावरण में मौजूद रहने वाला एक रसायन है. यह प्रकृति और मानव शरीर में पाया जाता है, पर इस की ज़्यादा मात्रा लंबे समय में नुकसानदायक होती है. इससे चमड़ी, बलेडर और फेफड़ों के कैंसर का खतरा होता है. उन्होंने कहा कि विभिन्न फसलों के पौदे जमीन से ज़्यादा मात्रा में आर्सेनिक लेते हैं, पर धान की फसल जमीन ओर पानी से अधिक मात्रा में आर्सेनिक प्राप्त करती है.

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