हैदराबाद. ऑल इण्डिया ब्राह्मण फैडरेशन के पूर्व अध्यक्ष व सलाहकार कोटाशंकर शर्मा ने कहा हैं कि दुनिया के विकसित देशों की कतार में आने को तैयार हो रहे भारत देश के नेतृत्वकर्ताओं को विकसित देशों की स्वस्थ्य परम्पराओं का पालन व अनुसरण कर आगे बढऩे का प्रयास करना चाहिए अन्यथा हम विकासशील की श्रेणी से अविकसित की श्रेणी में अग्रसर हो सकते हैं. देश में केन्द्र सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किये गये फैसले की अवहेलना कर ससंद के माध्यम से एससी/एसटी एक्ट को पुराने स्वरूप में संशोधित कर लाने के निर्णय को लेकर देशभर में हो रहे भारी विवाद व विरोध की स्थितियों को देखते हुए सरकार को इस मामले में पुर्नविचार करने की आवश्यकता है. 

शर्मा ने कहा कि केन्द्र में सत्ता संभालने वाले राजनैतिक दल को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे देश के सभी धर्मो, जातियों, वर्गो व क्षेत्र के लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और उन्हें वोट बैंक के स्थान पर देश की प्रगति, सामुदायिक सद्भाव और सहयोग का वातावरण बनाने का प्रयास करना चाहिए न कि वैमनस्य की परिस्थितियां बने, ऐसे कदम उठाने चाहिए? शर्मा ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के सम्मान की बात करने वाले राजनैतिक दलों के नेता देश की जनता की भावना, जनता के सामने आ रही समस्याओं व इसके अनुरूप सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्थाओं व फैसलों को लागू करने के स्थान पर आजादी के समय की परिस्थितियों का हवाला देकर बहुमत का दुरूपयोग करने का प्रयास कर रहे हैं, यह स्थिति ठीक नही माना जा सकता है. एससी/एसटी एक्ट जैसी व्यवस्था दुनिया के किसी देश में नहीं है जहां किसी की शिकायत पर दूसरे पक्ष को सुने बगैर कार्यवाही व जेल के प्रावधान हों, हमारे ऐसी शानदार उपलब्धि के बारे में देश के नेताओं को विदेश यात्राओं के दौरान जानकारी देनी चाहिए ताकि हमारे देश का सम्मान बढ़ सके !

उन्होंने कहा कि राममन्दिर, धारा 370 जैसे मामलों में कोर्ट की बात मानने की बात करने वाली केन्द्र सरकार वोट के लिये कोर्ट के फैसलों को पलटने में जुटी है, यह स्थिति ठीक नही मानी जा सकती है. शर्मा ने कहा कि आजादी के सत्तर साल से अधिक समय गुजरने के बाद अब तत्कालीन परिस्थितियों को लेकर बनाये गए कानूनों की समीक्षा किए जाने की आवश्यकता है. ऐसे कानूनों एवं संवेदनशील विषयों पर जनमत संग्रह के विकल्प का उपयोग कर काम किया जा सकता था. देशभर में किसी वर्ग विशेष के विरोध प्रदर्शन के चलते किये गये फैसले को लेकर शर्मा ने कहा कि मण्डल कमीशन के दौरान हुए घटनाक्रम की याद लोगों के मन मस्तिष्क में ताजा है और हाल ही हुआ विरोध उसके मुकाबले कुछ नहीं रहा फिर भी कानून को संसद की आड में बदला गया जबकि मण्डल कमीशन के दौरान हुए विरोध को महत्व नहीं दिया गया, यह देश के राजनैतिक दलों व नेताओं की किस मानसिकता को प्रदर्शित करता है, यह समझ से परे है? तथाकथित बुद्धिजीवी, विद्वान और समझदार की श्रेणी में आने वाले सामान्य वर्ग के लोग अपने हित अहित का चिन्तन तक नहीं कर पा रहे हैं और सामान्य वर्ग के हितों के विपरित फैसला लेने वाले लोगों को समर्थन दे रहे हैं? यह इस वर्ग के मानसिक दिवालिएपन की पराकाष्ठा है! देश की वर्तमान स्थितियों को देखते हुए सामान्य वर्ग के लोग जो अपने हित-अहित के बारे में सोच नहीं पा रहे हैं उन्हें मानसिक कमजोरी के आधार पर आरक्षण दिये जाने की आवश्यकता है, क्योंकि वे न तो एकजुट हैं न ही उनके द्वारा निर्वाचित जन प्रतिनिधि ससंद में कुछ कर पा रहे हैं! 

शर्मा ने कहा कि आरक्षण पात्र लोगों को मिले इसमें किसी को आपत्ति नहीं हो सकती है, परन्तु आरक्षण की सुविधा से सक्षम व सम्पन्न की श्रेणी में आ चुके लोग किस आधार पर यह सुविधा ले रहे हैं? यह विचारणीय है तथा सामान्य वर्ग के गरीबी की रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे लोग ऐसे आरक्षित वर्ग के सम्पन्न लोगों के साथ कैसे प्रतिस्पर्धा करें? इस बारे में ध्यान देकर विचार किये जाने की आवश्यकता है. आर्थिक आधार पर आरक्षण वर्तमान समय की आवश्यकता है, क्योकि देश में अब धर्म, जाति और वर्ग नही बल्कि आर्थिक स्थिति जीवनयापन का आधार है. 

शर्मा ने कहा कि आजादी के समय सभी सामान्य वर्ग के लोगो को सम्पन्न मानकर इस वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर गरीबों के लिये कोई व्यवस्था नहीं कर तत्कालीन समय के नेताओं ने जो अन्याय किया उसकी कीमत सामान्य वर्ग के वर्तमान प्रतिनिधियों को उठानी पड़ रही है. उसके बाद वोट बैंक व राजनैतिक लाभहानि ने आरक्षण को बढ़ाने का मार्गप्रशस्त किया जो आज भी जारी है. इस बारे में चिंतन नही किया तो भविष्य में भारी परेशानी होगी इसमे कोई संदेह नही है!

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