इनदिनों. केन्द्रीय भाजपा अगले आम चुनाव- 2019 में 2014 की कामयाबी दोहराने के लिए भले ही गैरभाजपाई महागठबंधन को मात देने के रास्ते तलाश रही हो, लेकिन एक अनजान सियासी खतरा भाजपा के भीतर भी पनप रहा है, लिहाजा... तीन प्रमुख राज्यों- एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा प्रादेशिक चुनाव हारे या जीते, आम चुनाव में तो भाजपा को नुकसान ही होगा?

यदि हारे तो ज्यादा नुकसान होगा और जीते तो थोड़ा कम नुकसान होगा, वजह? 2014 में केन्द्रीय सत्ता में आने के बाद पीएम नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को कितना महत्व दिया, यह जगजाहिर है! लिहाजा, आम चुनाव के नतीजे इस बात पर निर्भर हैं कि- 2014 के बाद पीएम-सीएम, सियासी तौर पर कितने पास? कितने दूर? हुए हैं! 

वर्ष 2014 में देश में भाजपा के संभावित पीएम उम्मीदवारों की सूची में एमपी के सीएम शिवराजसिंह चौहान, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे आदि के नाम भी खासे चर्चा में थे, लेकिन इन साढ़े चार वर्षों में ये नेता केवल प्रादेशिक सूची तक सीमित रह गए हैं? यह कैसे हुआ, इन नेताओं से बेहतर कोई और नहीं जान सकता है!

भले ही प्रादेशिक चुनाव हारें या जीतें, क्या ये सीएम 2014 जैसा, पीएम नरेन्द्र मोदी को सहयोग और समर्थन प्रदान कर पाएंगे? ये विरोध नहीं करें और आम चुनाव में उदासीन रहें तब भी केन्द्रीय भाजपा का बड़ा नुकसान हो जाएगा! क्योंकि... जैसे राजस्थान में 25 में से 25 लोकसभा सीटें भाजपा को मिली थी, यदि सबका साथ नहीं मिला तो कितनी सीटें भाजपा बचा पाएगी? 

पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पन्द्रह भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ मिशन- 2019 के लिए मंथन किया. वर्ष 2014 के आम चुनाव में भाजपा की ऐतिहासिक जीत में इनमें से देश के पांच प्रदेशों की प्रमुख भूमिका रही थी और आगे भी भाजपा का सियासी भविष्य इन्हीं पांच राज्यों पर निर्भर है? भाजपा शासित इन प्रदेशों में कुल 208 लोकसभा सीटें हैं जिनमें से 2014 के आम चुनाव में एनडीए को 193 सीटें मिली थीं. भाजपा को 172 सीटों तो सहयोगी दलों को 21 सीटें मिली थीं. अब 2019 में इन राज्यों में क्या होगा? इसी पर निर्भर है केन्द्रीय सत्ता में भाजपा की वापसी!

सबसे प्रमुख राज्य है- उत्तर प्रदेश, जहां पिछले आम चुनाव में भाजपा को 80 लोकसभा सीटों में से 71 जीतने में कामयाबी मिली थी तो 2 सीटें भाजपा के सहयोगी- अपना दल ने जीती थी, इस तरह से कुल 73 सीटें एनडीए को मिली थीं. इसके बाद हुए 2017 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने शानदार जीत दर्ज करवाई थी, परन्तु बाद के उपचुनावों में भाजपा के हिस्से में हार ही बची, कारण? सपा-बसपा साथ खड़े हो गए! अब यूपी में सपा-बसपा साथ हैं और आम चुनाव- 2019 सपा-बसपा ने मिलकर लड़ा तो भाजपा के लिए 2014 की आधी कामयाबी भी दोहराना मुश्किल हो जाएगा?

मध्य प्रदेश की सत्ता पर लंबे समय से शिवराज सिंह चौहान काबिज हैं. वर्ष 2014 के आम चुनाव में भाजपा को प्रदेश की कुल 29 में से 27 सीटें जीतने में कामयाबी मिली थी, लेकिन बाद में हुए रतलाम-झाबुआ संसदीय सीट पर उपचुनाव में भाजपा हार गई इसलिए इस वक्त भाजपा के पास 26 सीटें हैं! वर्ष 2019 में भाजपा को कितनी सीटें मिलती हैं, यह इस पर निर्भर है कि शिवराज सिंह चौहान का कितना सक्रिय सहयोग और समर्थन मिलता है?

राजस्थान में सीएम वसुंधरा राजे एकदम आश्वस्त हैं? जीते तो ठीक, हारे तो राजस्थान का इतिहास है, हर पांच साल में सरकार बदल देने का, लेकिन खास देखने वाली बात यह है कि विधानसभा चुनाव के बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में सीएम राजे कितनी ताकत से पीएम मोदी का साथ देती हैं? हालांकि, कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा की नाकामयाबी के बाद केन्द्रीय भाजपा के तौर-तरीकों में बदलाव आया और लगभग सारे प्रादेशिक अधिकार सीएम राजे को सौंप दिए गए, किन्तु साढ़े चार साल के केन्द्र और प्रदेश के आपसी संबंध आज भी बड़ा सवाल हैं?

वर्ष 2014 के आम चुनाव में पीएम नरेंद्र मोदी को दिल्ली की गद्दी तक पहुंचाने में राजस्थान की खास भूमिका रही थी, जब राज्य की कुल 25 की 25 सभी सीटें जीतने में भाजपा कामयाब रही थी? हालांकि, बाद में अजमेर और अलवर लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा को कांग्रेस ने हरा दिया था, लिहाजा इस वक्त भाजपा के पास 23 सीटें बची हैं!

गुजरात भाजपा का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता था, 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने विपक्ष का सफाया करते हुए सभी 26 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज करवाई थी, लेकिन मोदी मैजिक की शुरूआत भी गुजरात से हुई और पिछले वर्ष गुजरात में ही विधानसभा चुनाव से यह जादू बेअसर भी होने लगा, जब गुजरात में भाजपा 100 सीटों के नीचे आ गई! अब गुजरात में 26 सीटें फिर से हांसिल करना संभव नहीं जान पड़ता है?

महाराष्ट्र में भाजपा के लिए बड़ा संकट है? महाराष्ट्र में कुल 48 लोकसभा सीटों में से 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 23 और उसकी सहयोगी शिवसेना ने 18 सीटें जीती थी जबकि कांग्रेस 2 और एनसीपी 4 सीटों पर सिमट गई थी. जबकि भाजपा के गोंदिया संसदीय सीट से सांसद के पार्टी छोडऩे के बाद हुए उपचुनाव में एनसीपी ने जीत दर्ज करवाई, लिहाजा अब भाजपा के पास 22 सीटें ही बची हैं!

इस वक्त शिवसेना और भाजपा के रिश्ते भी ठीक नहीं हैं और दोनों दल 2019 में अलग-अलग चुनाव लडऩे के संकेत भी दे चुके हैं, जबकि कांग्रेस और एनसीपी एक साथ मिलकर चुनाव लडऩे की बात कर रहे हैं, मतलब? 2014 लोकसभा चुनाव जैसे नतीजे भाजपा के लिए संभव नहीं हैं?

सियासी सारांश यही है कि प्रादेशिक चुनाव में भले ही भाजपा एक बार कामयाबी हांसिल कर ले, आम चुनाव- 2019 में 2014 की सफलता हांसिल करना बेहद मुश्किल है!

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