इनदिनों. नई दुनिया के संपादक आशीष व्यास ने मध्यप्रदेश के ठेठ ग्रामीण से लेकर महानगरों तक के जन-जीवन को करीब से देखा-समझा है. वे राजस्थान में दैनिक भास्कर के विभिन्न संस्करणों के संपादक भी रहे हैं. देश में नशे के बढ़ते खतरे को फोकस करते हुए उनका प्रसंगवश लेखन- नशे के खिलाफ सात राज्य जाग गए, मप्र की नींद कब खुलेगी? सटीक सवाल उठाता है! आशीष व्यास लिखते हैं... सात दिन पहले की ही बात है, हरियाणा की मेजबानी में पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, चंडीगढ़, उत्तराखंड और नई दिल्ली के मुख्यमंत्रियों ने मिलकर ड्रग्स के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया!

20 अगस्त को, राज्यों की नीयत-नेकदिली से दिए गए संयुक्त बयान को देखकर लग रहा है इस बार यह कदम सिर्फ नशा मुक्ति आंदोलनों की फेहरिस्त में एक और प्रयास जोडऩे जैसा नहीं होगा! बल्कि यह अपने-अपने राज्यों के युवाओं-बच्चों का भविष्य बचाने के लिए जमीनी प्रयास की तरफ बढ़ाया गया कदम होगा. लेकिन, चिंता यह है कि इसमें मध्य प्रदेश कहीं नहीं है! दुष्कर्म, महिला-बाल अपराधों को लेकर देशभर में सबसे आगे मध्य प्रदेश है और ऐसी घटनाओं के पीछे नशा ही एक बड़ा कारण बनकर लगातार सामने आ रहा है. लेकिन, नशे के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर हो रही कोशिशों में मप्र का शामिल नहीं होना शासन की समझ-सक्रियता पर सवाल उठा रहा है!

गृह मंत्रालय की वर्ष 2016 की रिपोर्ट के अनुसार दूसरे राज्यों की तुलना में मध्य प्रदेश में 2014 से नशीले पदार्थ जब्त करने के मामले काफी हद तक बढ़े हैं. इफेड्रीन ड्रग (दवा) के मामले में तो मध्य प्रदेश ने पंजाब को भी पीछे छोड़ दिया है! क्योंकि, मप्र में हर साल पंजाब से दोगुना ज्यादा इफेड्रीन जब्त हो रही है! महाराष्ट्र से लेकर दक्षिण भारत में होने वाली रेव पार्टियों में भी इंदौर सहित आसपास के इलाकों से ड्रग सप्लाय है! बहरहाल, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दखल दिया है!

इसलिए, उम्मीद की जा रही है इस बार, किसी ठोस कार्ययोजना के साथ ही सरकार सामने आएगी. जब पंजाब के सीएम अमरिंदर सिंह तमाम मत-मनभेद भुलाकर पड़ोसी राज्य हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से इस लड़ाई में साथ मांग सकते हैं तो मध्य प्रदेश का नेतृत्व किसकी प्रतीक्षा कर रहा है? बहरहाल, नशे के खिलाफ सात राज्य जाग गए, मप्र की नींद कब खुलेगी? के माध्यम से आशीष व्यास ने जो सवाल खड़े किए है वे विचारणीय हैं, क्योंकि नशे के बढ़ते उपयोग के कारण युवाओं पर तो असर नजर आ ही रहे हैं, इससे पनपने वाले कई प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष अपराध, सामाजिक जीवन में भी जहर घोल रहे हैं! क्या एमपी सरकार इस मुद्दे की गंभीरता समझ पाएगी?

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