रक्षाबंधन एक ऐसा बंधन है जो आपको बचाता है. कुछ उच्चतम के साथ आपका बंधन होने की वजह से आप बच जाते हो. जीवन में बंधन होना आवश्यक है, पर किसके साथ? 

ज्ञान, गुरु, सच्चाई और स्वयं के साथ बंधन होना आपको बचाता है.जैसे  एक रस्सी आपको बांध भी सकती है या आपकी रक्षा भी कर सकती है वैसे ही आपका छोटा मन आपको अनावश्यक चिजों से बांध रखेगा पर बडा मन यानी कि ज्ञान आपकी रक्षा करेगा,  आपको मुक्त करेगा. 

तीन तरह के बंधन

बंधन तीन तरह के होते हैं-  सात्विक, राजसिक  और तामसिक. सात्विक बंधन आपको ज्ञान, सुख और आनंद से बांधता है. राजसिक बंधन आपको हर तरह की इच्छा और आकांक्षाओं से बांधता है. तामसिक बंधन में आपको किसी प्रकार की खुशी नहीं मिलती पर एक संबंध का अनुभव होता है. उदाहरण के तौर पर, धुम्रपान करने वाले को उससे कोई सुख नहीं मिलता पर उसे यह आदत छोडने में कठिनाई होती है. रक्षाबंधन एक सात्विक बंधन है जिससे  आप अपने आपको  सबसे प्रेम और ज्ञान से बांधते हो.

यह दिन भाई बहन के संबंध का समर्थन करता है. बहन अपने भाई की कलाई पर पवित्र धागा बांधती है. यह धागा बहन के अपने भाई के प्रति अस्सीम प्रेम और भावनाओं को व्यक्त करता है जिसे सही मायने में 'राखी' कहते हैं . इसके बदले में भाई अपनी बहन को तोहफा देता है और उसकी रक्षा करने का वादा करता है. रक्षाबंधन अलग अलग तरीके से मनाया जाता है. भारत के विभिन्न प्रांतों में उसे राख्री,  बलेवा और सलूनो भी कहते है.

रक्षाबंधन की कथाएँ

राखी बांधने की प्रथा भारत के पुराण कथाओं में भी पाई जाती है. एक किंवदंती के अनुसार असुर राजा बली भगवान विष्णु जी के बहुत बड़े भक्त थे. भगवान विष्णु जी ने अपना वैकुंठ निवास छोड़ राजा बली के राज्य की रक्षा करने का भार संभाला हुआ था. देवी लक्ष्मी अपने भगवान को वापस वैकुंठ निवास में पाना चाहती थी. 

देवी लक्ष्मी जी ब्राह्मण महिला का रूप ले कर राजा बली के पास शरण मांगने गयी  जब तक उनके पति वापस नहीं आते. राजा बली ने उनको शरण में लिया और अपनी बहन की तरह रक्षा की .

श्रावण पुर्णिमा के उत्सव के समय देवी लक्ष्मी जी  ने राजा को पवित्र धागा बांधा. राजा बली इस बात से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने देवी जी को वर में जो चाहे मांगने के लिए कहा. वरदान पाते ही देवी अपने असली रूप में प्रकट हुई और उनके राजा के पास आने का असली कारण बताया. देवी जी की इस सदिच्छा और उद्देश्य से राजा प्रसन्न हुए और भगवान विष्णु जी को देवी लक्ष्मी जी के साथ वापस वैकुंठ जाने का  अनुरोध किया.

इस तरह भारत के कुछ भागों में इस त्योहार को बलेवा कहा जाता है जो राजा बली के अपने भगवान और अपनी बहन के प्रति उनकी भक्ति जताता है. ऐसा कहा जाता है कि तबसे बहन को राखी बांधने के लिए या रक्षाबंधन के लिए आमंत्रित करने की प्रथा बन गयी.

हालाँकि अब यह त्योहार भाई बहन के लिए बताया जाता है ऐसे हमेशा से नहीं था. इतिहास में ऐसे उदाहरण है जिसमें राखी रक्षा को प्रतित करने के लिए बांधी गयी थी और  सिर्फ बहन ही नहीं बल्कि पत्नी, बेटी और माँ ने भी बांधी थी. ऋषि मुनि उन  लोगों को राखी बांधते थे जो उनके पास आशिर्वाद मांगने आते थे. संत खुदकी  बुराई और दुष्टता से रक्षा करने के लिए अपने आपको बांधते थे.  यह 'पाप तोडक, पुण्य प्रदायक पर्व ' है, या जैसे कि शास्त्रों में कहा गया है यह दिन सारे वरदान प्रदान करता है और सब पापों को खत्म कर देता है.

जब हम समाज में रहते हैं तो वहां हमेशा कोई अनबन, गलतफहमियां, मतभेद होते रहते हैं जिससे तनाव, असुरक्षा की भावना और भय पैदा हो जाता है. जब समाज भय में जीता है तो वह डूब जाता है. जब परिवार के सदस्य एक दुसरे के भय में जीते हैं तो वह परिवार खत्म हो जाता है. तो रक्षाबंधन आश्वासन देने का  त्योहार है  है कि, 'देखो,  मैं तुम्हारे साथ हूँ.' 

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