नजरिया. भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारणी की सितंबर- 2018 में दिल्ली में बैठक होने जा रही है. इस बैठक का सबसे बड़ा मुद्दा होगा- इस साल के अंत में तीन प्रदेशों और अगले साल होने वाले आम चुनाव- 2019 की रणनीति क्या रहेगी? इस बैठक में पीएम नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह सहित भाजपा के तमाम प्रमुख नेता मौजूद रहेंगे!

जो सियासी हालात बन रहे हैं उनको देखते हुए लगता है कि केन्द्रीय भाजपा से पीएम मोदी का एकाधिकार कमजोर पड़ता जा रहा है, ऐसी स्थिति में पीएम मोदी और अमित शाह अपनो के ही सवालों के घेरे में नजर आएंगे? इन तकरीबन साढ़े चार साल में भाजपा में केवल और केवल इन दोनों के निर्णय ही लागू होते रहे हैं. शुरूआत के तकरीबन साढ़े तीन वर्ष तक केन्द्रीय भाजपा की कामयाबी ने पार्टी के भीतर एक तरफा अनुशासन कायम कर दिया था, लेकिन गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद यह एक तरफा अनुशासन कमजोर पड़ता गया और अब तो पीएम मोदी का जादू पार्टी के अंदर भी बेअसर होने लगा है? यही वजह है कि भाजपा को अब पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के सहारे की जरूरत पड़ गई है!

सबसे बड़ी बात यह है कि अगले आम चुनाव- 2019 तक अब केवल भाजपा की ही परीक्षा है? और इस अग्रि-परीक्षा का सामना इन्हें अकेले करना है? 

उधर, कांग्रेस बेहतर स्थिति में है, क्योंकि कांग्रेस की चुनावी परीक्षा का वक्त गुजर गया है और उसके पास खोने के लिए कुछ खास है भी नहीं? आगे तीन प्रमुख राज्यों- राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव हैं जिनमें भाजपा की ही अग्रिपरीक्षा है, भाजपा को अपनी सत्ता बचानी है, जबकि... इन चुनावों में कांग्रेस को अपनी बढ़ती ताकत का अहसास कराना है और इसीलिए यह कांग्रेस के लिए बेहतर अवसर भी है!

ताजा सर्वे ने जहां कांग्रेस का जोश बढ़ा रहे हैं वहीं भाजपा के लिए खतरे की घंटी बजा रहे हैं, बावजूद इसके... कांग्रेस को बेहद सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि सियासी प्रबंधन के मामले में कांग्रेस बेहतर स्थिति में नहीं है, जबकि भाजपा लगातार अपनी गलतियों/कमियों पर नजर रखते हुए सुधारात्मक रणनीति अपना रही है?

हालांकि, इस बार लगता नहीं है कि भाजपा प्रभावी सुधार कर पाएगी, वजह? भाजपा ने अपने ही वोट बैंक- सामान्य वर्ग को नाराज कर दिया है!

पीएम मोदी सामान्य वर्ग के लिए कुछ खास तो कर नहीं पाए, बल्कि एससी/एसटी एक्ट के कारण सामान्य वर्ग के निशाने पर और आ गए हैं? 

शायद उन्हें लगा होगा कि देशहित के दूसरे मुद्दों की आड़ में सामान्य वर्ग को हमेशा की तरहा इस बार भी भ्रमित करने में कामयाब हो जाएंगे?

बहरहाल, यह मुद्दा ठंडा पड़ेगा, ऐसा लगता नहीं है! खबर है कि... एससी/एसटी अत्याचार कानून में तत्काल एफआइआर और तुरंत गिरफ्तारी बहाल करने वाले संशोधित कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए लाए गए संशोधित कानून को बराबरी, अभिव्यक्ति की आजादी और जीवन के मौलिक अधिकार के खिलाफ  बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की गई है?

इस याचिका में न केवल एससी/एसटी अत्याचार निरोधक संशोधित कानून 2018 को रद्द करने, वरन उसके क्रियान्यवयन पर भी रोक लगाए जाने की मांग की गई है!

संशोधित कानून को चुनौती देते हुए इस याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के निदोर्षों को बचाने वाले तर्क संगत फैसले को केन्द्र सरकार ने वर्ग विशेष को खुश करने के उद्देश्य से कानून में संशोधन कर दिया?

याद रहे, इस संशोधन से सबसे ज्यादा प्रभावित सामान्य वर्ग हो रहा है जो अब तक भाजपा का सबसे बड़ा मतदाता वर्ग रहा है, जाहिर है... इस संशोधन से भाजपा को कुछ खास फायदा तो होना नहीं है, बड़ा नुकसान होने की ज्यादा आशंका है!

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