"41.72 मीटर बैंड पर एक अनजान जगह से यह इंडियन नेशनल कांग्रेस का रेडियो है." एक गुप्त रेडियो स्टेशन से यह आवाज़ उषा मेहता की थी.  

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब महात्मा गांधी को ग़िरफ्तार कर प्रेस पर पाबंदी लगा दी गई, तब इस रेडियो स्टेशन ने स्वतंत्रता के लिए चिंगारी को जीवित रखा.

अंग्रेजों की पकड़ से दूर रहने के कारण इसकी जगह रोज बदल दी जाती थी. इसका पहला प्रसारण गांधीवादी नेता उषा मेहता ने किया. जुझारू प्रकृति की स्वतंत्रता सेनानी उषा मेहता 5 साल की उम्र में महात्मा गांधी के संपर्क में आईं. वह गांधी के विचारों से प्रभावित हुए बिना न रह सकीं.

इसके बाद इन्होंने गांधी के कई आंदोलनों में भी भाग लिया. आजादी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के बाद उषा मेहता महिलाओं के उत्थान के लिए भी प्रयासरत रहीं.

भारत की आजादी के लिए अग्रेजों के खिलाफ इन्होंने क्रांति का बिगुल ऐसे समय में फूंका, जब इनकी उम्र बहुत छोटी थी. ऐसे में आइए एक बार फिर से ऐसी महान महिला स्वतंत्रता सेनानी के बारे जानते हैं –

छोटी उम्र से ही बनीं गांधी की प्रशंसक

25 मार्च 1920 को गुजरात के सूरत में जन्मीं उषा मेहता के पिता ब्रिटिश राज में जज थे. जब वह छोटी थीं, तभी गांव में लगी गांधी की एक सभा ने उन्हें अपनी ओर आकर्षित किया. क्रांति की ज्वाला तो सभी में धधक रही थी, फिर बच्चा क्या और बूढ़ा क्या!

ऐसे में उषा मेहता गांधी के विचारों और दर्शन से प्रभावित हुईं. उसका असर ये हुआ कि उन्होंने सारी सुख-सुविधाओं को त्याग दिया और सामान्य जीवनशैली अपना ली.

गांधी द्वारा लगाए जाने वाले कैंपों से उन्होंने खादी कपड़ा बनाना सीखा और उन्हें पहनना शुरू कर दिया. वो अपने पिता से बोलीं कि “अभी वो अपनी आगे की पढ़ाई को विराम देंगी, क्योंकि अभी देश के लिए घर से बाहर आना ज़रूरी है.”

लगाए 'साइमन, वापस जाओ' के नारे

1928 में इन्हें बाल नेता को तौर पर पहचान मिलनी शुरू हो गई. महज़ आठ साल की उम्र में उषा मेहता साइमन कमीशन के विरोध में आयोजित 'साइमन, वापस जाओ' आंदोलन का हिस्सा बनीं. ब्रिटिश राज के खिलाफ उनकी जबान से निकला ये पहला नारा था.

उषा मेहता के साथ साइमन कमीशन के विरोध में नारे लगाने के लिए बड़ी संख्या में वहां और भी बच्चे मौज़ूद थे. इस उम्र में उनको यह अंदाज़ा नहीं था कि उनके विरोध का कितना महत्व है. वह महात्मा गांधी के साथ आज़ादी की लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहीं.

1930 में पिता सरकारी सेवा से रिटायर हो गए. इसके बाद इनका पूरा परिवार बंबई आ गया. यहीं इन्होंने आगे की पढ़ाई के लिए चंदरमजी हाईस्कूल में दाखिला ले लिया.

अब वह अपनों से मिलने और उन तक संदेश पहुंचाने के बहाने, सक्रिय रूप से क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो गईं. इसी दौरान दर्शनशास्त्र विषय से फ़र्स्ट क्लास स्नातक कर उन्होंने आगे कानून की पढ़ाई शुरू कर दी.

इसी बीच, अंग्रेजों द्वारा भारत विभाजन की बात कही गई, जिसके कारण देश में तनाव की स्थिति बढ़ने लगी. वहीं, भारत को एक संप्रभु राष्ट्र बनाने के लिए कांग्रेस ने भी पूर्ण स्वराज का नारा बुलंद कर दिया था.

कांग्रेस के सीक्रेट रेडियो काे चलाया

देश को अंग्रेजी शासन से मुक्त कराने के लिए जब गांधी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की शुरूआत की, तो सारा देश उनके इस क़दम पर चल पड़ा. ब्रिटिश हुक़ूमत ने घबराकर 9 अगस्त 1942 को गांधी सहित अन्य कांग्रेसियों को गिरफ्तार कर लिया. वहीं, अंग्रेज सरकार ने भारत में चलने वाले सभी रेडियो ब्रॉडकास्टिंग लाइसेंस रद्द कर दिए.

ऐसे में कांग्रेस ने नरीमन प्रिंटर और नानक मोटवानी से सहयोग का आग्रह कर रेडियो प्रसारण में सहायता मांगी. इस तरह 27 अगस्त 1942 को बॉम्बे के चौपाटी इलाक़े में सी व्यू बिल्डिंग के सबसे ऊपर वाले माले पर एक ट्रांसमीटर लगा कर कांग्रेस के गुप्त रेडियो का प्रसारण शुरू किया गया.

इस रेडियो स्टेशन के पहले प्रसारण में उषा मेहता ने इन शब्दों के साथ शुरूअात की कि "41.78 मीटर बैंड पर एक अनजान जगह से यह इंडियन नेशनल कांग्रेस का रेडियो है."

‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का संदेश, मेरठ में 300 सैनिकों के मारे जाने की सहित अन्य खबरें, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने अपने प्रसारणों में सेंसर कर दिया था, इस रेडियो स्टेशन ने प्रसारित किया. इस गुप्त रेडियो के प्रसारण की जगह रोजाना बदल दी जाती थी, ताकि अंग्रेज हुकूमत उसे पकड़ न सके.

पहले कांग्रेस के इस गुप्त रेडियो का ट्रांसमिटर 10 किलोवॉट का था, जिसे नरीमन प्रिंटर ने जल्द ही 100 किलोवॉट का कर दिया. पुलिस से बचने के लिए ट्रांसमिटर को 3 महीने में ही सात अलग-अलग जगहों पर ले जाया गया.

जेल में गुजारे 4 साल

अंग्रेजों से बचते बचाते उषा मेहता द्वारा संचालित कांग्रेस का यह गुप्त रेडियो कुल 88 दिनों तक चला. यह तीन तरणों, पहला 27 अगस्त 1942, दूसरा फरवरी से मार्च 1943 और जनवरी 1944 के पहले सप्ताह में प्रसारित हुआ.

इस रेडियो प्रसारण में विठ्टल भाई झावेरी, चंद्रकांत झावेरी और बबलूभाई ठक्कर भी उषा मेहता के साथ रहे.

इतिहासकार गौतम चटर्जी अपनी “Secret Congress Broadcasts and Storming Railway Tracks During Quit India Movement” में लिखते हैं कि जब क्रांति की आवाजें शून्य थीं. उस अंधकार भरे उन क्षणों में कांग्रेस सीक्रेट रेडियो ने लोगों को साहस और प्रेरणा प्रदान की. इसने हिन्दुस्तानियों के बीच पंथनिरपेक्षता, अंतरराष्ट्रीयता, भाईचारा और स्वतंत्रता की भावना का प्रसार किया.

हालांकि जल्द ही इन्हें पकड़ लिया गया और जेल में डाल दिया गया. सीक्रेट कांग्रेस रेडियो चलाने के कारण इन्हें 4 साल की जेल हुई. जेल में उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया और अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा.

बहरहाल, आजादी की उम्मीद में जल्द ही इनकी सजा पूरी हो गई और 1946 में इन्हें रिहा कर दिया गया.

1946 में जेल से रिहाई के बाद उषा मेहता ने अपनी पढ़ाई  भी जारी रखी और मुंबई विश्वविद्यालय से पीएचडी पूरी की. उषा मेहता की क्रांति और आजादी के लिए संघर्ष ताउम्र चलता रहा. एक ओर जहां वह आज़ादी के पहले तक देश को स्वतंत्र कराने के लिए संघर्षरत रहीं, वहीं दूसरी ओर आजादी के बाद समाज की उन्नति में लगी रहीं.

गांधी की हत्या के बाद इन्होंने गांधी की सामाजिक और राजनीतिक विचारधारा को आम जन तक पहुंचाया. गांधीवाद और क्रांति की ज्वाला को फैलाने वाली प्रसिद्ध कांग्रेसी उषा मेहता को भारत सरकार ने 1998 में देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मविभूषण से अलंकृत किया गया. इसी के साथ 11 अगस्त 2000 को उषा मेहता ने अपने जीवन की अंतिम सांस लीं.

साभार: roar.media

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